जब हंस चुगे दाना, कौआ खाए मोती — क्या यही है वह कलियुग जिसकी चेतावनी राम ने सिया को दी थी

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हंस भूखा, कौआ तृप्त: एक भजन जो आज की हर स्क्रीन पर उतर आया है

डॉ.नवीन आनंद जोशी

भारतीय लोक-परंपरा में कुछ रचनाएँ समय से परे होती हैं — वे किसी एक युग के लिए नहीं लिखी जातीं, बल्कि हर युग को अपने भीतर झाँकने का अवसर देती हैं। “हे रामचन्द्र कह गए सिया से” शीर्षक यह लोकप्रिय भजन, जहाँ श्रीराम माता सीता को कलियुग के लक्षण बताते हैं, ऐसी ही एक कालातीत रचना है। पुराणों और रामचरितमानस में वर्णित कलियुग-वर्णन की यह लोक-अभिव्यक्ति सदियों से गाँव-गाँव, गली-गली में गूँजती रही है। परंतु आज, जब हर हाथ में एक चमकती हुई स्क्रीन है, यह भजन अचानक भविष्यवाणी नहीं, वर्तमान का वर्णन लगने लगता है।
भजन की सबसे मार्मिक पंक्ति है — हंस चुगेगा दाना दुनका, कौआ मोती खायेगा। हंस सदा से विवेक और सत्य के चयन का प्रतीक रहा है, वह नीर-क्षीर विवेकी कहलाता है। आज यदि हम चारों ओर देखें, तो यही दृश्य किसी और रूप में साकार होता प्रतीत होता है। जो सामग्री गहरी है, सार्थक है, जीवन को दिशा देने वाली है, वह किसी कोने में दबी रह जाती है — और जो कुछ क्षण भर का शोर है, सतही है, वह लाखों निगाहों तक पहुँच जाता है। यह कोई आरोप नहीं, केवल एक अवलोकन है — कि हमारा समय अब मूल्य से अधिक गति को महत्व देने लगा है। जो हाथ कभी दिनभर में एक पन्ना भी शांति से पढ़ लेते थे, वे अब मिनट-मिनट में एक नई चमक की तलाश में उँगली सरकाते रहते हैं। यह भजन नहीं कहता कि यह किसका दोष है — यह केवल इतना कहता है कि जब चयन की शक्ति हाथ से छूट जाए, तो हंस भी भ्रमित हो सकता है।
धरम भी होगा कर्म भी होगा लेकिन शरम नही होगी — यह पंक्ति किसी एक पीढ़ी की आलोचना नहीं, बल्कि एक समय की तस्वीर है, जहाँ बाहरी आडंबर तो शेष है परंतु भीतर की मर्यादा कहीं धुँधली पड़ने लगी है। आज सार्वजनिक मंच इतने सुलभ हो गए हैं कि हर क्षण, हर भाव, हर आवेग को तत्काल प्रदर्शित किया जा सकता है। यह सुविधा है, पर इसी सुविधा ने भीतर के संकोच, ठहराव और आत्मचिंतन के लिए स्थान भी कम कर दिया है। बात-बात पे माता-पिता को बेटा आँख दिखायेगा — इसमें भी दोष किसी व्यक्ति का नहीं, उस बदलती हुई गति का है, जिसमें संवाद के लिए समय दुर्लभ होता जा रहा है और हर सदस्य अपनी अलग स्क्रीन में अपनी अलग दुनिया बसा चुका है। जहाँ पहले परिवार एक थाली, एक आँगन और एक साँझ की बातचीत में जुड़ता था, वहाँ अब हर कोई अपने ही हाथ की चमकती खिड़की में खोया रहता है।
मंदिर सुना सुना होगा, भरी होगी मधुशाला — यह पंक्ति भी किसी को कठघरे में खड़ा नहीं करती, केवल यह स्मरण कराती है कि जहाँ कभी सामूहिक श्रद्धा और मौन का स्थान था, वहाँ अब सतत शोर, प्रदर्शन और तात्कालिक मनोरंजन ने डेरा डाल लिया है। पिता के संग संग भरी सभा में नाचेगी घर की बाला — इस पंक्ति को किसी नैतिक निर्णय की तरह नहीं, बल्कि एक चेतावनी की तरह पढ़ा जाना चाहिए, जो मर्यादा और स्वतंत्रता के बीच के संतुलन पर गहराई से सोचने का निमंत्रण देती है, बिना किसी पर उँगली उठाए। “भरी सभा” का अर्थ अब केवल गाँव का चौपाल या सार्वजनिक आयोजन नहीं रहा — आज हर मोबाइल स्क्रीन के भीतर एक अदृश्य, असीमित सभा बैठी रहती है, जो चौबीसों घंटे देख रही होती है। रील बनाना, नाचना, स्वयं को प्रस्तुत करना — यह अपने आप में न अच्छा है न बुरा, यह तो अभिव्यक्ति का एक नया माध्यम भर है। परंतु प्रश्न यह उठता है कि जब घर की मर्यादा और घर का प्रदर्शन एक ही पल में, एक ही परिवार के सामने घुल-मिल जाते हैं, तो भीतर कहीं वह पतली रेखा धुँधली पड़ने लगती है जो निजता और सार्वजनिकता को अलग रखती थी। पहले जो कुछ घर की चारदीवारी के भीतर, अपनों के बीच सहज भाव से घटित होता था, वह अब लाखों अनजान आँखों के लिए सायास प्रस्तुत किया जाने लगा है — और इस दौड़ में कई बार यह भेद कर पाना कठिन हो जाता है कि यह सच्ची अभिव्यक्ति है या केवल “व्यूज़” और स्वीकृति की भूख। भजन इस भेद को मिटा देने की नहीं, बल्कि उसे पहचानते रहने की सीख देता है — कि स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए भी, यह स्मरण रहे कि हर प्रदर्शन के पीछे कोई मूल्य, कोई प्रयोजन अवश्य होना चाहिए, केवल भीड़ की तालियाँ नहीं।
..जो होगा लोभी और भोगी, ओ जोगी कहलायेगा — यह पंक्ति भी आज विशेष अर्थ रखती है, जहाँ आभासी दुनिया में ज्ञान और आध्यात्म की भाषा बोलना बहुत सरल हो गया है, परंतु उसे भीतर उतारना अब भी उतना ही कठिन है जितना पहले था। यह अंतर, यह दूरी — छवि और सत्य के बीच की यह खाई — शायद इस युग की सबसे बड़ी परीक्षा है।
फिर भी, यह भजन निराशा का गीत नहीं है। यह एक स्मरण है, एक सजगता का आह्वान है। कलियुग का वर्णन इसलिए किया गया ताकि मनुष्य समय रहते चेत जाए, न कि इसलिए कि वह हार मान ले। जब हम अपने हाथ की स्क्रीन को कुछ क्षण के लिए विराम दें और भीतर की उस शांत आवाज़ को सुनें, जो अब भी हंस और कौए में भेद करना जानती है — तभी यह भविष्यवाणी अपना अर्थ खोने लगेगी। दोष देने से अधिक आवश्यक है लौटना — अपने भीतर, अपने परिवार की ओर, अपनी जड़ों की ओर। यही इस प्राचीन भजन का सबसे गहरा संदेश है: चेतावनी अभिशाप नहीं होती, वह एक अवसर होती है — बदलने का, लौटने का, फिर से हंस बनने का।

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