इन दिनों शहर में “सीलिंग-सीलिंग” का खेल चल रहा है। कुछ लोगों को इसमें बड़ा मज़ा आ रहा होगा, लेकिन एक सवाल हर नागरिक के मन में है कि जब ये निर्माण हो रहे थे, तब नगर निगम और जिला प्रशासन आखिर कहाँ था?
आज हजारों लोगों को बेरोजगार करने की तैयारी है। दुकानें सील हो रही हैं, कारोबार बंद किए जा रहे हैं, सख्ती दिखाई जा रही है। लेकिन जब रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक निर्माण खड़े हो रहे थे, जब शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बन रहे थे, जब भवन अनुज्ञा की शर्तों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा था, तब प्रशासन की आँखें क्यों बंद थीं?
अतिक्रमण और नियमों के उल्लंघन एक दिन में नहीं होते। ईंट-दर-ईंट निर्माण होता है, मंज़िल-दर-मंज़िल इमारत खड़ी होती है। उस समय न तो नोटिस दिखाई देते हैं, न कार्रवाई। लेकिन जब पूरा निर्माण हो जाता है, कारोबार जम जाता है, लोगों की रोज़ी-रोटी उससे जुड़ जाती है, बच्चों की फीस, घर का किराया और परिवार का गुज़ारा उसी पर निर्भर हो जाता है, तब अचानक प्रशासन की नींद खुलती है।
अब अदालत के आदेश सिर पर हैं, तो जेसीबी और हथौड़े लेकर मैदान में उतर आए हैं। सवाल यह नहीं कि कार्रवाई नियमों के तहत हो रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन की जवाबदेही सिर्फ अदालत के आदेशों के बाद ही शुरू होती है? यदि समय रहते निगरानी और कार्रवाई होती, तो आज इतनी बड़ी संख्या में लोग बेरोजगारी के मुहाने पर खड़े नहीं होते।
कानून का पालन जरूरी है, लेकिन संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही जरूरी है। नियमों के नाम पर लोगों की आजीविका पर चोट करने से पहले यह भी सोचना होगा कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है—वह व्यापारी जिसने निवेश किया या वह तंत्र जिसने वर्षों तक सब कुछ होते हुए देखा और अनदेखा किया?
शहर को जवाब चाहिए।
शहर को जवाब चाहिए!
