डॉ. नवीन आनंद जोशी
उज्जैन के महाकाल वन में प्रतिष्ठित 84 महादेवों की परंपरा आस्था, पौराणिक आख्यानों और आध्यात्मिक संदेशों की अनुपम धरोहर है। इसी पावन परंपरा में वीरेश्वर महादेव की कथा त्याग, मातृ-ममता, तपस्या और शिव-कृपा की अद्भुत गाथा के रूप में सामने आती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार अमित्रजित नामक एक धर्मपरायण राजा हुए। देवर्षि नारद के निर्देश पर वे पाताल लोक की चंपावती नगरी पहुंचे। वहां उन्होंने कंकालकेतु नामक दानव का वध किया और विद्याधर-कन्या मलयगंधिनी को उसके बंधन से मुक्त कराया। इसके बाद दोनों का विवाह हुआ और वे अवंतिका लौटकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गए।
रानी मलयगंधिनी ने माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए अभीष्ट तृतीया का व्रत किया। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें शिवांश से युक्त एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया। समय आने पर पुत्र का जन्म हुआ, लेकिन राजदरबार के ज्योतिष-विद्वानों ने बताया कि उसका जन्म ‘अभुक्त मूल’ में हुआ है। उस समय प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव में रानी ने राजा और पुत्र, दोनों के मंगल की कामना से नवजात शिशु को विकटा देवी के मंदिर में एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया।
कथा के अनुसार, कुछ योगिनियों की दृष्टि उस बालक पर पड़ी। उन्होंने उसे अपने संरक्षण में लिया और उसे शिक्षा, संस्कार तथा जीवनोपयोगी ज्ञान प्रदान किया। सोलह वर्ष बाद जब वह बालक अवंतिका लौटा, तब माता-पिता से उसका पुनर्मिलन अत्यंत भावुक था। वर्षों का विरह मां के स्नेहिल आलिंगन में जैसे पिघलकर बह गया।
इसके बाद राजकुमार ने राजसी वैभव के बजाय भगवान शिव की कठोर तपस्या को अपना जीवन-पथ चुना। उसकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ज्योतिर्मय स्वरूप में उसके सामने प्रकट हुए। राजकुमार ने सांसारिक सुख-सुविधाओं का वरदान नहीं मांगा, बल्कि भव-बन्धन से मुक्ति की कामना की। उसकी तपस्या से संबद्ध शिवलिंग आगे चलकर वीरेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
मूल नक्षत्र : भय नहीं, गहराई
पारंपरिक ज्योतिष में ‘मूल’ का अर्थ जड़ या मूल कारण माना जाता है। इसे गहन चिंतन, जिज्ञासा और सत्य की खोज से भी जोड़ा जाता है। हालांकि ये सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं हैं, वैज्ञानिक दृष्टि से जन्म नक्षत्र के आधार पर जीवन के परिणाम निर्धारित होने का कोई निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
वीरेश्वर महादेव की कथा का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—जन्म की परिस्थिति मनुष्य की शुरुआत हो सकती है, उसकी पहचान नहीं। उसकी वास्तविक पहचान संस्कार, कर्म, तपस्या, संकल्प और पुरुषार्थ से बनती है।
इसलिए मूल नक्षत्र को भय की दृष्टि से देखने के बजाय ज्ञान, आत्मविश्वास और आत्मविकास की संभावनाओं के रूप में देखना अधिक सार्थक है। यही वीरेश्वर महादेव की पावन गाथा का शाश्वत संदेश है।
