समाज का पतन — सोचने की ज़रूरत

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मुस्लिम समाज इस भरोसे में है कि उसके रहबर उसकी सही राहनुमाई करेंगे,
और रहबर इस भरोसे में हैं कि अगर हम खामोश रहेंगे तो हुकूमत हमसे खुश रहेगी।

इसी खामोशी और गलतफहमी के बीच समाज हर दिन गिरावट की तरफ बढ़ता जा रहा है।
आज का नौजवान चौराहों पर, सड़कों पर, दुकानों के बाहर अपनी जवानी बरबाद कर रहा है।
वक़्त, जो उसकी सबसे बड़ी दौलत है, यूं ही हाथों से फिसल रहा है।
चाय-पान पिकनिक पार्टी देर रात जागने की महफिलों में, गुटखा-सिगरेट के धुएं में,
न सिर्फ उसका जिस्म कमजोर हो रहा है, बल्कि उसका ज़ेहन भी बुझता जा रहा है।
न इल्म की फिक्र है, न तरक्की की चाह,
बस दिखावे की ज़िंदगी और बेफिक्र लम्हों में पूरी जवानी खर्च हो रही है।
एक और अहम पहलू भी सोचने लायक है—
ज़कात और चंदा, जो असल में गरीबों और जरूरतमंदों का हक़ है,
वो हमेशा सही हाथों तक पूरा नहीं पहुंच पाता।
कहीं न कहीं इसकी तक़सीम में कमी, लापरवाही या गैर-शफ़्फ़ाफ़ी नजर आती है,
जिसकी वजह से असली हकदार वंचित रह जाते हैं,
और कुछ लोग इसी सिस्टम का फायदा उठाकर गरीब का हक मारकर ऐशो आराम की ज़िंदगी जीते हैं।
अगर अब भी समाज नहीं जागा,
तो आने वाला वक़्त और भी ज़्यादा मुश्किल होगा।
ज़रूरत है सिर्फ देने की नहीं,
बल्कि ये देखने की भी है कि हम किसे और कैसे दे रहे हैं।
हमें शफ़्फ़ाफ़ सिस्टम, सही निगरानी और ईमानदारी के साथ
समाज को उसके असली मक़सद तक पहुंचाना होगा।
क्योंकि जब तक हम खुद नहीं बदलेंगे,
कोई रहबर, कोई हुकूमत हमें नहीं बदल सकते है

हमारे लिखने से बदलाव नही आएगा बदलाव आयेगा जब,
जब लोग सोचने और समझने को तैयार होंगे

admin1

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