“अभिव्यक्ति विचारयात्रा ” का आयोजन : प्रगतिशील युवा भारत और बुजुर्गों की भूमिका पर सार्थक विमर्श

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भोपाल। “अभिव्यक्ति विचारयात्रा” श्रृंखला के तृतीय एपिसोड के अंतर्गत, जवाहर चौक स्थित सभागार में डॉ अभिजीत देशमुख के अध्यक्षता में बौद्धिक विमर्श कार्यक्रम गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का विषय था— “प्रगतिशील युवा भारत और पीछे छूटते बागवान : जिम्मेदारी, संवेदना और समाधान।” डॉ. अभिजीत देशमुख ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा हमारे देश की युवा शक्ति अत्यंत प्रतिभाशाली, ऊर्जावान और समर्पित है, जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में निरंतर उत्कृष्ट कार्य कर रही है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि आज का युवा नवाचार, तकनीक और परिश्रम के माध्यम से देश को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का प्रयास कर रहा है।

किन्तु इसी के साथ एक चिंता का विषय भी सामने आ रहा है—हमारा सामाजिक ढाँचा धीरे-धीरे कमजोर होता प्रतीत हो रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों का बढ़ना और माता-पिता से भावनात्मक दूरी का बढ़ना, समाज के लिए एक गंभीर संकेत है। हमारे वे माता-पिता, जिन्होंने हमें संस्कार, शिक्षा और पहचान दी, आज कई बार अकेलेपन का सामना कर रहे हैं। कुछ घटनाएँ तो इतनी संवेदनशील रही हैं कि अपने ही बच्चों का अंतिम समय में साथ न मिल पाना समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।

विकसित भारत का अर्थ केवल आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर या उन्नत तकनीक नहीं है, बल्कि एक सशक्त, संवेदनशील और संतुलित सामाजिक व्यवस्था भी है। इसमें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का भी समान महत्व है।

इसलिए यह हम सभी, विशेषकर युवाओं की जिम्मेदारी है कि हम अपने परिवार, अपने माता-पिता और अपने मूल्यों के प्रति संवेदनशील रहें। उनके अकेलेपन को समझें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

एक सच्चा विकसित भारत वही होगा, जहाँ प्रगति के साथ-साथ रिश्तों की गरमाहट और सामाजिक संतुलन
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता गोकुल सोनी ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, किन्तु इस विकास यात्रा में बुजुर्गों के अनुभव और मार्गदर्शन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवार और समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जहाँ बुजुर्ग सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। देश के विकास में जब बुजुर्गों का अनुभव और युवा शक्ति का जोश तथा टेक्नोलॉजी मिलकर काम करेंगे तभी देश समृद्ध होगा। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ अभिजीत देशमुख ने कहा कि संवेदनशील समाज ही सशक्त समाज का निर्माण करता है । डॉ नवीन आनंद जोशी ने विषय को वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए कहा कि आधुनिकता की दौड़ में पारिवारिक मूल्यों का क्षरण एक गंभीर चुनौती है। उन्होंने समाधान के रूप में पीढ़ियों के बीच संवाद, सम्मान और सहयोग की संस्कृति को विकसित करने पर बल दिया।
विचारगोष्ठी में समाज, साहित्य और बौद्धिक जगत से जुड़े अनेक विद्वानों, साहित्यकारों एवं जागरूक नागरिकों ने अपने अनुभव व विचार व्यक्त करते हुए जो प्रश्न किए, उनका मुख्य वक्ता गोकुल सोनी ने समुचित समाधान किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन एवं संयोजन मनोज जैन द्वारा किया गया। उन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित एवं प्रभावी ढंग से संचालित किया। इस अवसर पर अनेक गणमान्य नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें प्रसिद्ध व्यंगकार श्री यशवंत गोरे बी एल गोहिया, सुशील विश्वकर्मा, सूर्य सिंह , मोहित मिश्रा, हरि मोहन तिवारी, संतोष मिश्रा, उपेंद्र सिंह, भानुप्रकाश त्रिपाठी, राममुनि पाल, कपिल कुमार तिवारी, संदीप पाठक, राकेश श्रीवास्तव, सुश्री रत्ना चौहान, दीपक कोहली, ललित कुमार परमार सहित अन्य सहभागी शामिल रहे। अंत में “सबका सहारा” संस्था के सचिव सुबोध श्रीवास्व ने सभी का आभार व्यक्त किया ।

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