SBI इकोरैप – भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता

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मुंबई: अमेरिकी प्रशासन वैश्विक स्तर पर नाटो, टैरिफ और भारत जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में रणनीतिक अनिश्चितता और अधूरी जानकारी को सौदेबाजी के एक मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की नवीनतम रिसर्च रिपोर्ट ‘इकोव्रैप’ के अनुसार, अमेरिका का यह रुख अन्य देशों को लगातार इस असमंजस में डालता है कि वे झुकें, इंतजार करें, परीक्षा लें या फिर जवाबी कदम उठाएं। हालांकि यह रणनीति अमेरिका को अल्पकालिक बढ़त (शॉर्ट-रन लेवरेज) दिलाती है, लेकिन इसके चलते वैश्विक सहयोगियों और बाजारों के बीच दीर्घकालिक विश्वास में कमी आती है, जो अंततः भविष्य के संकेतों को कम आंकना शुरू कर देते हैं।

रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि अमेरिकी प्रशासन अपनी सौदेबाजी की रणनीति को सामने वाले देश के पास उपलब्ध जवाबी क्षमता (काउंटर-लेवरेज) के आधार पर तय करता है। जहां चीन के पास महत्वपूर्ण खनिजों, निर्यात नियंत्रणों और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के दबाव के कारण बेहद केंद्रित जवाबी क्षमता है, वहीं भारत नाटो सहयोगियों और चीन के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। भारत के पास अपने विशाल बाजार के आकार, तकनीकी प्रतिभा, फार्मास्यूटिकल्स, रक्षा खरीद, ऊर्जा विकल्पों, प्रवासी प्रभाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत संतुलनकर्ता के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान के कारण व्यापक रणनीतिक क्षमताएं मौजूद हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के संदर्भ में, एसबीआई रिसर्च का सुझाव है कि भारत के लिए सबसे बेहतर रणनीति यह होगी कि वह मुख्य द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किए बिना अमेरिका के शुरुआती कड़े रुख को धीमा करे। विश्लेषण के अनुसार, भारत को बातचीत का माहौल अनुकूल बनाए रखना चाहिए, सार्वजनिक रूप से विवाद को बढ़ाने से बचना चाहिए और सीमित व प्रतिवर्ती (रिवर्सिबल) प्रस्ताव पेश करने चाहिए। अमेरिका की शुरुआती मांगों को जब अमेरिकी बाजार की अपनी लागतों और गठबंधन की थकान का सामना करना पड़ेगा, तब वाशिंगटन की वास्तविक न्यूनतम स्वीकार्य कीमत (रिजर्वेशन प्राइस) स्पष्ट होगी। भारत को वार्ता के अंतिम दौर में मजबूती से सौदेबाजी करनी चाहिए, जब एक बाजार, प्रौद्योगिकी भागीदार और रक्षा खरीदार के रूप में उसका मूल्य पूरी तरह दृश्यमान हो।

रिपोर्ट निष्कर्ष निकालती है कि भारत को अमेरिकी प्रशासन के संकल्प को परखने के लिए तैयार रहना चाहिए, भले ही इसके लिए अल्पावधि में कुछ लागत उठानी पड़े, और यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि भारत लंबी अवधि के खेल में अपनी जमीन पर मजबूती से खड़ा है। इस बीच, वैश्विक आर्थिक परिदृश्य अभी भी इन भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। हालांकि युद्ध को समाप्त करने के लिए 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से मिलने वाले शिपिंग डेटा दिखाते हैं कि यातायात में केवल आंशिक और असमान सुधार हुआ है, जिसमें एलएनजी और उर्वरक से संबंधित खेपें अभी भी पूरी तरह से गायब हैं।

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