भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि संस्कार, परंपरा और आने वाली पीढ़ियों के निर्माण का संकल्प माना गया है। इसी भारतीय जीवन-दृष्टि और लोकपरंपरा को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘कोहबर’ का आज भोपाल में विमोचन हुआ।
मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पुस्तक का विमोचन किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक कृष्णमोहन झा विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।
कोहबर…*
एक शब्द, लेकिन इसके भीतर छिपी है भारतीय लोकसंस्कृति, दाम्पत्य परंपरा और जीवन-मूल्यों की एक पूरी दुनिया।
लेखक अनिल झा की पुस्तक ‘कोहबर’ भारतीय विवाह परंपरा को केवल एक सामाजिक रस्म के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसके भीतर छिपे प्रेम, मर्यादा, संस्कार और पारिवारिक उत्तरदायित्व को सामने लाती है।
पुस्तक में श्रीराम और माता सीता, भगवान शिव और माता पार्वती, नल-दमयंती तथा अज-इंदुमती जैसे प्रसंगों के माध्यम से भारतीय परंपरा में प्रेम की उदात्त अवधारणा को प्रस्तुत किया गया है।
कोहबर की लोकपरंपरा में सूर्य, चंद्रमा, नवग्रह, पशु-पक्षी, वृक्ष और प्रकृति के अनेक प्रतीकों का अंकन भी होता है। यानी यहां दाम्पत्य केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रकृति, परिवार और समाज से जुड़ जाता है।
विमोचन समारोह में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने पुस्तक के लेखक को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय विवाह परंपरा परिवार और संस्कारों की निरंतरता से जुड़ी हुई है। उन्होंने ‘कोहबर’ को अपनी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार कृष्णमोहन झा ने भी अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि—
“संस्कार केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण की आधारशिला हैं।”
झा ने कहा कि तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में हमारी लोकपरंपराएं धीरे-धीरे विस्मृत होती जा रही हैं। ऐसे समय में ‘कोहबर’ जैसी कृतियां नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और जीवन-मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं।
पुस्तक के लेखक अनिल झा ने कहा कि ‘कोहबर’ लिखने का उद्देश्य भारतीय दाम्पत्य परंपरा के पीछे छिपे संस्कार, प्रेम, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
कार्यक्रम में डॉ. एच.एम. मिश्रा, डॉ. एच.आर. रैदास, श्री रमेश दुबे, श्री एस.के. बेहरे, श्री शिवदत्त मिश्रा, श्री विनय कुमार झा, श्री कौशल झा, श्री सुधीर के. झा, श्री नविंदु मिश्रा, श्री ज्योतिरादित्य झा और श्री रमेश झा सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
‘कोहबर’ का यह विमोचन केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं, बल्कि अपनी लोकपरंपराओं, संस्कारों और सांस्कृतिक स्मृति को पुनः समझने का एक अवसर भी बन गया।
