भोपाल एक ऐसी सामुदायिक सहकारी पहल का तसव्वुर है, जिसका बुनियादी मक़सद लोगों को सूद और ब्याज से पाक माल, बचत की आदत, और माली ख़ुद-मुख़्तारी की तरफ़ लाना है। इस निज़ाम की बुनियाद अमानतदारी, शफ़्फ़ाफ़, बाहमी तआवुन, इंसाफ़ और ज़िम्मेदार रवैये पर क़ायम करने का मक़सद है। इसका उद्देश्य यह है कि समुदाय के लोग एक-दूसरे के तआवुन से माली तौर पर मज़बूत हों और ज़रूरत के वक़्त उन्हें सूद पर क़र्ज़ लेने की मजबूरी न हो। बाहमी तआवुन से माली मज़बूती और माली मज़बूती से ख़ुद-मुख़्तारी की तरफ लाया जाए।
1.बुनियादी तसव्वुर आज बहुत से ख़ानदान बीमारी, तालीम, कारोबार, बेरोज़गारी, घर की ज़रूरतों या अचानक पेश आने वाले हालात की वजह से माली परेशानियों का सामना करते हैं। ऐसे वक़्त में आम तौर पर लोग ब्याज पर क़र्ज़ लेने पर मजबूर हो जाते हैं, जिससे उनकी माली परेशानी और बढ़ सकती है। इस सूद-रहित तआवुनी निज़ाम का मक़सद एक ऐसा मुनज़्ज़म विकल्प तैयार करना है जिसमें समुदाय के लोग बचत, बाहमी तआवुन और शरीअत के मुताबिक़ माली उसूलों के ज़रिए एक-दूसरे के लिए सहारा बन सकें।
2.अहम मक़ासिद इस निज़ाम के अहम मक़ासिद में शामिल हैं कि सूद और ब्याज से पाक माली निज़ाम को फ़रोग़ देना, सदस्यों में नियमित बचत की आदत पैदा करना, माली पाबंदी और मुस्तक़बिल की बेहतर मंसूबाबंदी को बढ़ावा देना, ज़रूरी चीज़ों और कारोबार के लिए मुनासिब माली सहूलत विकसित करना,छोटे कारोबार और ख़ुद-रोज़गारी को फ़रोग़ देना, ख़वातीन को माली तौर पर बा-इख़्तियार बनाना, नौजवानों को हुनर, रोज़गार और कारोबार से जोड़ना, ज़रूरतमंद सदस्यों के लिए मुनासिब सूद-रहित सहूलत का निज़ाम विकसित करना, समुदाय में बाहमी तआवुन और समाजी ज़िम्मेदारी की रूह पैदा करना
3. इस्लामी मॉडल इस उसूल पर कारोबार आधारित मॉडल विकसित किया जाता है। इस मॉडल में संस्था किसी ज़रूरी माल, सामान, मशीनरी, औज़ार या कारोबारी सामान को पहले ख़रीदकर, उसकी असल लागत और अपना मुनाफ़ा वाज़ेह करते हुए, तयशुदा शर्तों के मुताबिक़ सदस्य को फ़रोख़्त करती है। इसका बुनियादी मक़सद ब्याज पर रक़म उधार देना नहीं, बल्कि हक़ीक़ी माल की ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त पर मबनी लेन-देन करना है। इस व्यवस्था को लागू करने से पहले उसके तमाम शरई, क़ानूनी और हिसाबी पहलुओं को मुनासिब माहिरों और मुतअल्लिक़ा क़वानीन के मुताबिक़ तय किया जाता है। 4.बचत और इस निज़ाम में समुदाय के लोग अपनी हैसियत के मुताबिक़ नियमित बचत या योगदान के ज़रिए इस निज़ाम का हिस्सा बन सकते हैं। छोटी रकम से शुरू की गई बाक़ायदा बचत भी मुस्तक़बिल में माली पाबंदी और बेहतर मंसूबाबंदी का ज़रिया बन सकती है। संस्था का मक़सद सदस्यों में यह शऊर पैदा करना होता है कि बचत सिर्फ़ रक़म जमा करना नहीं, बल्कि मुस्तक़बिल की माली हिफ़ाज़त की तैयारी है।
5.कारोबार और ख़ुद-रोज़गारी संस्था का एक अहम मक़सद सदस्यों को रोज़गार और ख़ुद-रोज़गारी के मौक़ों से जोड़ना होता है। मुराबहा आधारित मॉडल के ज़रिए ज़रूरी कारोबारी सामान, मशीनरी, औज़ार या दूसरी जायज़ अश्या की ख़रीद में सहूलत दी जा सकती है। मिसाल के तौर पर—मोबाइल रिपेयरिंग का सामान,छोटे कारोबार की मशीनरी, फ़ूड कारोबार का सामान, इलेक्ट्रिकल या प्लम्बिंग के औज़ार,घरेलू कारोबार से मुतअल्लिक़ सामान जैसी ज़रूरतों के लिए मुनासिब मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। मक़सद सिर्फ़ माली सहूलत देना नहीं, बल्कि सदस्य को कमाने के क़ाबिल और ख़ुद-मुख़्तार बनाना है।
6.ख़वातीन के लिए तआवुनी प्रोग्राम ख़वातीन की माली मज़बूती पूरे ख़ानदान की तरक़्क़ी में अहम किरदार अदा करती है। संस्था ख़वातीन को-सिलाई-कढ़ाई, घरेलू कारोबार, खाद्य उत्पाद, डिजिटल काम, हुनर की तर्बियत, बचत और छोटे कारोबार से जोड़ने के लिए प्रोग्राम विकसित कर रही है। इसका मक़सद ख़वातीन को माली तौर पर बा-इख़्तियार बनाना और उनके हुनर को आमदनी के ज़रिए में तब्दील करने में मदद करना होगा।
7. नौजवानों के लिए मौक़े नौजवान किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताक़त हैं। संस्था नौजवानों को—हुनर की तर्बियत, डिजिटल स्किल, रोज़गार की रहनुमाई, कारोबार की बुनियादी मालूमात,ख़ुद-रोज़गारी,छोटे कारोबार, उद्यमिता से जोड़ने की कोशिश कर रही है। मक़सद यह है कि नौजवान सिर्फ़ रोज़गार तलाश करने वाले न रहें, बल्कि अपनी सलाहियत और हुनर के ज़रिए रोज़गार पैदा करने वाले उद्यमी बनें।
8.तालीम और सेहत माली तौर पर कमज़ोर ख़ानदानों के बच्चों की तालीम समाज की अहम ज़िम्मेदारी है। संस्था अपनी क्षमता और क़वायद के मुताबिक़ तालीम, किताबों, फ़ीस, हुनर की तर्बियत और शैक्षणिक ज़रूरतों से जुड़े प्रोग्राम विकसित कर सकती है। इसी तरह ज़रूरतमंद सदस्यों के लिए सेहत और इलाज से जुड़ी मुनासिब सहूलत या तआवुनी प्रोग्राम भी विकसित किए जा सकते हैं।
9. शफ़्फ़ाफ़ियत और जवाबदेही किसी भी माली सहकारी संस्था की असल बुनियाद भरोसा है।इसलिए संस्था में बाक़ायदा हिसाब-किताब और ऑडिट, आमदनी और अख़राजात का रिकॉर्ड,बैंकिंग ज़राए का इस्तेमाल,हर लेन-देन का दस्तावेज़ी रिकॉर्ड, वाज़ेह क़वायद और उपविधियाँ, बोर्ड/कमेटी की निगरानी, सदस्यों को ज़रूरी मालूमात, शिकायत के अज़ाले का निज़ाम को अहमियत दी जाती है। तमाम माली सरगर्मियाँ सहकारी क़वानीन, उपविधियों और नियामकीय तक़ाज़ों के मुताबिक़ संचालित की जाती है।
10. हमारा विज़न एक ऐसा सूद-रहित, शफ़्फ़ाफ़ और तआवुनी माली निज़ाम विकसित करना जहाँ समुदाय के लोग बचत, कारोबार, रोज़गार और ख़ुद-मुख़्तारी की तरफ़ आगे बढ़ सकें। हमारा ख़्वाब है कि कोई ज़रूरतमंद सूद की मजबूरी में न फँसे, हर शख़्स को माली मंसूबाबंदी का शऊर मिले,नौजवानों को रोज़गार और कारोबार के मौक़े मिलें, ख़वातीन माली तौर पर मज़बूत हों,और समुदाय बाहमी तआवुन से तरक़्क़ी की तरफ़ बढ़े।
11.हमारा मिशन है कि “सूद से पाक, इस्लामी माली उसूलों, बाहमी तआवुन, शफ़्फ़ाफ़ियत और ख़ुद-मुख़्तारी के ज़रिए एक मज़बूत, मुनज़्ज़म, ख़ुशहाल समुदाय की तामीर हो और वो तरक़्क़ी की जानिब आगे बढ़ें”
सहूलत क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड
