माइक्रोमीटर, एमफिन का प्रमुख प्रकाशन है, जिसमें भारतीय माइक्रोफाइनेंस उद्योग की तिमाही आधार पर प्रगति को प्रस्तुत करता है।
30 जून 2026 तक माइक्रोफाइनेंस का संचालन 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और 718 जिलों में फैला हुआ है। हालांकि वर्ष की पहली तिमाही ऐतिहासिक रूप से धीमी रहती है, लेकिन वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आंकड़ों से पता चलता है कि उद्योग में तिमाही-दर-तिमाही 1.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और पिछली तिमाही में शुरू हुई वृद्धि की गति कायम रही है।
30 जून 2026 तक माइक्रोफाइनेंस उद्योग का कुल पोर्टफोलियो 3,28,708 करोड़ रुपये रहा। हालांकि, सालाना आधार पर उद्योग के पोर्टफोलियो में 6.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के दौरान उद्योग ने 61,718 करोड़ रुपये के ऋण वितरित किए, जो पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की तुलना में 8.9 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि है।
पोर्टफोलियो की गुणवत्ता में भी और सुधार हुआ है। PAR 31-180 यानी 31 से 180 दिनों तक बकाया पोर्टफोलियो, जो वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही के अंत में 5.6 प्रतिशत था, 30 जून 2026 तक घटकर 1.6 प्रतिशत रह गया। पिछली तिमाही में यह 2.1 प्रतिशत था, इसलिए तिमाही आधार पर भी इसमें महत्वपूर्ण सुधार हुआ है।
पोर्टफोलियो में हिस्सेदारी के लिहाज से एनबीएफसी-एमएफआई की कुल उद्योग पोर्टफोलियो में 44.3 प्रतिशत हिस्सेदारी है। बैंक 25.3 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर हैं, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में उनकी हिस्सेदारी थोड़ी कम हुई है। एसएफबी और एनबीएफसी की हिस्सेदारी में मामूली वृद्धि हुई है।
सालाना आधार पर एनबीएफसी-एमएफआई के पोर्टफोलियो में 5.2 प्रतिशत ओर एनबीएफसी के पोर्टफोलियो में 2.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं, बैंकों के पोर्टफोलियो में 28.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसका अधिकांश हिस्सा माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो को रिटेल श्रेणी में पुनर्वर्गीकृत किए जाने के कारण है, जिससे उद्योग के कुल पोर्टफोलियो में भी गिरावट आई।
तिमाही के दौरान सदस्य एनबीएफसी-एमएफआई को प्राप्त फंडिंग में सालाना आधार पर 91.4 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई। फंडिंग में यह वृद्धि छोटे, मध्यम और बड़े—सभी श्रेणियों के एनबीएफसी-एमएफआई में देखने को मिली। माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र अभी भी सबसे बड़ा क्षेत्र है और इसकी हिस्सेदारी 36.6 प्रतिशत है। दक्षिणी क्षेत्र दूसरे स्थान पर बना हुआ है, हालांकि पिछले एक वर्ष में उसकी हिस्सेदारी लगभग 1.4 प्रतिशत घट गई है।
शीर्ष तीन राज्यों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। बिहार पहले स्थान पर है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु का स्थान है। शीर्ष 10 राज्यों की कुल हिस्सेदारी उद्योग के पोर्टफोलियो में लगभग 83 प्रतिशत है।
एमफिन के सीईओ एवं निदेशक डॉ. आलोक मिश्रा ने कहा, “उद्योग ने पिछली तिमाही में दिखाई गई वृद्धि की गति को बनाए रखा है। यह लगातार सात तिमाहियों तक रही मंदी के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव है। वृद्धि मुख्य रूप से एनबीएफसी-एमएफआई और अधिक ऋण राशि से प्रेरित रही है, जो मौजूदा उधारकर्ताओं के आसपास एक हद तक समेकन को दर्शाती है। गार्डरेल्स के साथ-साथ इस स्थिति ने पोर्टफोलियो की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार में योगदान दिया है, क्योंकि ऋण वितरण का बड़ा हिस्सा ऐसे उधारकर्ताओं को किया जा रहा है, जिनका औपचारिक वित्तीय प्रणाली में स्थापित क्रेडिट इतिहास है। पोर्टफोलियो की स्थिति को उम्मीद से बेहतर मानसून से भी लाभ मिला है। राजस्थान को छोड़कर शीर्ष 10 राज्यों में से किसी भी राज्य में जून के बाद मानसून के पूर्वानुमान में गिरावट नहीं आई है। माइक्रोफाइनेंस के कई बड़े बाजारों में सामान्य या लगभग सामान्य बारिश हुई है। इससे स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिला है और फिलहाल मांग में कमी चिंता का विषय नजर नहीं आ रही है।
हालांकि जीएलपी में मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन माइक्रोफाइनेंस ब्यूरो से रिटेल ब्यूरो में ऋणों के स्थानांतरण के कारण यह वृद्धि अपेक्षा से काफी कम रही। चूंकि नियम स्पष्ट हैं कि 3 लाख रुपये से कम वार्षिक घरेलू आय वाले परिवारों को दिए गए सभी असुरक्षित ऋण माइक्रोफाइनेंस की श्रेणी में आते हैं, इसलिए इस मुद्दे को आरबीआई के समक्ष उठाया गया है। इसी से संबंधित, रिपोर्टिंग अनुपालन माइक्रोफाइनेंस परिवारों के लिए निर्धारित घरेलू आय सीमा से निकटता से जुड़ा हुआ है, इसलिए इन सीमाओं की भी समीक्षा की जानी चाहिए। वर्ष 2022 में पिछली बार संशोधन के बाद से घरेलू आय, मजदूरी और सामान्य मूल्य स्तर में काफी वृद्धि हुई है, जिससे मौजूदा 3 लाख रुपये की सीमा का वास्तविक मूल्य कम हो गया है।”
