राजधानी भोपाल में मध्य प्रदेश लिपिक वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ ने अनुकंपा नियुक्ति के नियमों और सीपीसीटी की बाध्यता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संघ के प्रांतीय अध्यक्ष मुकेश चतुर्वेदी ने सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए इसे ‘काला कानून’ करार दिया है।
मुकेश चतुर्वेदी (प्रांतीय अध्यक्ष, म.प्र. लिपिक वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ
अनुकंपा नियुक्ति के नए नियमों पर नाराजगी:
”लंबे समय से, 2013 के बाद, समाज प्रशासन द्वारा सीपीसीटी के नए कानून या अनुकंपा नियुक्ति भर्ती के जो नए नियम बनाए गए हैं, मैं आपके माध्यम से ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ की— इसके पहले जो नियम थे, उसमें कोई भी अनुकंपा साथी को नौकरी से नहीं निकाला जाता था। लेकिन यह जो काला कानून है, इससे हमारे अनुकंपा साथियों को सेवा से निकाला जा रहा है। इसको सरकार को तत्काल वापस लेना चाहिए।”
”अनुकंपा का उद्देश्य ही खत्म हो गया है। अनुकंपा नियुक्ति इसलिए दी जाती है कि हमारे मृत साथी कर्मचारी के परिवार के लालन-पालन के लिए । परन्तु उन्होंने ऐसी शर्तें लाद दी हैं कि वो रोज-रोज मर रहा है, 5 साल, 7 साल से परेशान है। सीपीसीटी का कहर पूरे परिवार पर है। वो मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया है हमारा साथी। सरकार तत्काल लाखों रुपए कोर्ट-कचहरी में खर्च कर रहा है और कार्यालय में वो सारे काम कर रहा है जो उसकी योग्यता के हैं। तो सरकार को सबसे पहले सीपीसीटी की बाध्यता अनुकंपा नियुक्ति से खत्म करनी चाहिए, उसका सरलीकरण करना चाहिए।”
समान काम-समान वेतन और विसंगतियों पर प्रहार:
मंत्रालय के साथी, जिनको अलग से मंत्रालय भत्ता मिलता है, वे हमारे सतपुड़ा, विंध्याचल और मैदानी बाबुओं से ज्यादा वेतन मान ले रहे हैं। यह हमारे साथ अन्याय है। समान काम का समान वेतन हमारा संवैधानिक अधिकार है। बाबा साहेब अंबेडकर हमको उसका अधिकार देते हैं, सम्मान। और सरकार नीतिगत निर्णय के नाम पर हमको उस सुविधाओं से वंचित कर रही है, यह दोहरा लाभ ले रहे हैं। हमको मंत्रालय के समान लिपिक साथियों को समयमान वेतनमान देना होगा सरकार को।”
और चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि अगर सरकार हमारी मांगे नहीं मानती है तो इससे बड़ा आंदोलन भोपाल के सड़कों पर होगा।”
