आत्मबोध से विश्वकल्याण तक की सनातन यात्रा*

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डॉ. नवीन आनंद जोशी जब विश्व अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है, तब यह स्मरण आवश्यक है कि योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय ऋषि-परंपरा द्वारा मानवता को सौंपा गया आत्मबोध, संतुलन और विश्वकल्याण का दिव्य विज्ञान है।

आज योग करोड़ों लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है, किंतु उसकी जड़ें उसी सनातन चेतना में स्थित हैं, जिसका उद्गम भगवान शिव के स्वरूप में दृष्टिगोचर होता है। भारतीय दर्शन में शिव केवल देवता नहीं — वे आदियोगी हैं, योग के प्रथम आचार्य, ध्यान के परम स्रोत और आत्मानुभूति के सर्वोच्च प्रतीक। इसलिए जब भी योग की चर्चा होती है, उसके मूल में महाकाल का ही दिव्य स्वरूप प्रकट होता है।
भारतीय परंपरा के अनुसार सृष्टि के आरंभिक काल में, जब मानव जीवन भौतिक और आध्यात्मिक प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था, भगवान शिव ने समाधिस्थ अवस्था में योग का ज्ञान प्रकट किया। कैलाश पर स्थित वह ध्यानमग्न स्वरूप मात्र धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि इस सत्य की उद्घोषणा है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति बाहरी संसार में नहीं, उसके अंतर्मन में निहित है। शिव ने योग के माध्यम से यह संदेश दिया कि जो व्यक्ति अपने मन, प्राण और चेतना को साध लेता है, वह स्वयं को जान लेता है — और जो स्वयं को जान लेता है, उसके लिए समस्त संसार का ज्ञान सहज सुलभ हो जाता है।
कश्मीर शैव दर्शन के अमूल्य ग्रंथ शिवसूत्र में भगवान शिव ने योग को किसी कर्मकांड या बाह्य प्रदर्शन से नहीं जोड़ा, बल्कि उसे आत्मचेतना की प्रत्यक्ष अनुभूति का मार्ग बताया। शिवसूत्र का उद्घोष — “चैतन्यमात्मा” — स्पष्ट करता है कि चेतना ही आत्मा है। योग का प्रयोजन शरीर को मोड़ना नहीं, चेतना को जागृत करना है। आधुनिक युग में, जब मनुष्य तकनीकी उन्नति के शिखर पर पहुंचकर भी मानसिक तनाव, अकेलेपन, भय और असंतोष से जूझ रहा है, शिवसूत्र का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। योग मनुष्य को स्वयं के भीतर लौटना सिखाता है; वह बाहरी उपलब्धियों के बीच आंतरिक शांति खोजने का मार्ग प्रशस्त करता है।
शिवपुराण में भगवान शिव को योगेश्वर, महायोगी और योगियों के स्वामी के रूप में वर्णित किया गया है। शिव-पार्वती संवादों में योग, ध्यान, प्राणशक्ति, समाधि और आत्मज्ञान के गूढ़तम रहस्य निहित हैं। शिव बार-बार स्पष्ट करते हैं कि मन की चंचलता ही बंधन का मूल कारण है, और मन की स्थिरता ही मुक्ति का द्वार है। आज की त्वरागामी जीवनशैली में यही शिक्षा मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। योग हमें केवल रोगों से नहीं बचाता — वह जीवन को संतुलन, संयम और सार्थकता प्रदान करता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने भी योग को जीवन का अनिवार्य आधार माना। श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः योग का ही महान ग्रंथ है। गीता के अठारह अध्याय विभिन्न योगों की व्याख्या करते हैं — कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग और संन्यासयोग। श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध वचन “योगः कर्मसु कौशलम्” योग की व्यापकता को उद्घाटित करता है। यहां योग केवल आसन नहीं, जीवन के प्रत्येक कर्म को उत्कृष्टता, समर्पण और संतुलन के साथ साधने की कला है। जब मनुष्य परिणामों का मोह त्यागकर कर्तव्य को ही साधना बना लेता है, तब उसका संपूर्ण जीवन स्वयं योगमय हो जाता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित चौंसठ कलाओं का प्रयोजन केवल मनोरंजन या कौशल विकास नहीं था, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र निर्माण था। इन कलाओं में मानसिक, बौद्धिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास का सजीव समन्वय निहित था। योग भी इसी समग्र जीवनदृष्टि का अनिवार्य अंग माना गया। हमारे पूर्वजों ने योग को किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं रखा — राजा से लेकर ऋषि तक, गृहस्थ से लेकर विद्यार्थी तक, सभी के लिए योग जीवन का अनिवार्य अनुशासन था। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता ने सहस्रों वर्षों तक ज्ञान, संतुलन और आध्यात्मिक ऊंचाइयों को अक्षुण्ण बनाए रखा।
आज जब योग दिवस पर करोड़ों लोग योगाभ्यास कर रहे हैं, यह समझना भी अनिवार्य है कि योग का वास्तविक प्रयोजन केवल स्वास्थ्य-लाभ नहीं। यदि योग केवल शरीर तक सीमित रह जाए तो उसका प्रभाव क्षीण होगा; किंतु जब योग मन, विचार और आचरण तक पहुंचता है, तभी वह व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को रूपांतरित करता है। योग मनुष्य को स्वयं से जोड़ता है, परिवार को संस्कारों से जोड़ता है, समाज को सद्भाव से जोड़ता है और राष्ट्र को आत्मविश्वास से जोड़ता है।
महाकाल का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्रों वर्ष पूर्व था। वे स्मरण कराते हैं कि जीवन की वास्तविक विजय बाहरी संसार पर नहीं, अपने भीतर के विकारों पर अर्जित होती है। योग उसी विजय का साधन है। यही कारण है कि योग भारत की सांस्कृतिक धरोहर मात्र नहीं, मानवता के भविष्य की अनिवार्यता बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हमें केवल योग करने का संकल्प नहीं, योग को जीने का संकल्प लेना चाहिए। जब शिव का ध्यान, कृष्ण का कर्मयोग और भारतीय ऋषियों की आत्मबोध परंपरा हमारे जीवन का अंग बनेगी, तभी योग दिवस का वास्तविक प्रयोजन सिद्ध होगा। महाकाल की नगरी उज्जयिनी से लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक आज यही संदेश पहुंचना चाहिए कि योग केवल अभ्यास नहीं, आत्मा से परमात्मा तक की सनातन यात्रा है — एक ऐसी यात्रा, जो व्यक्ति से विश्व और विश्व से परम सत्य तक का मार्ग प्रशस्त करती है।

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