जांच से बचने हाईकोर्ट पहुंचे जयदीप, याचिका खारिज; अब जांच में सामने रखने होंगे समाज से जुड़े दस्तावेज वर्तमान में इंदौर में दो विधायक हैं समाज से

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मुराई मौर्य समाज विवाद में धर्मेंद्र वर्मा एवं अन्य प्रतिवादियों को बड़ी कानूनी मजबूती, धारा 32 के तहत जांच का रास्ता साफ

इंदौर। मुराई (मौर्य) समाज इंदौर एवं श्री मुराई समाज धर्मशाला से जुड़े विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अध्यक्ष जयदीप द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है। जयदीप ने Assistant Registrar द्वारा 7 मई 2025 को मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रिकरण अधिनियम, 1973 की धारा 32 के तहत शुरू की गई जांच की कार्रवाई को चुनौती देते हुए उसे निरस्त करने की मांग की थी। हालांकि हाईकोर्ट ने Assistant Registrar की कार्रवाई को कानून के अनुरूप मानते हुए याचिका खारिज कर दी।

इस मामले में धर्मेंद्र वर्मा एवं अन्य निजी प्रतिवादियों ने समाज के हित में अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष रखा और यह स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी को धारा 32 के तहत स्वप्रेरणा से जांच शुरू करने का अधिकार है। निजी प्रतिवादियों की ओर से यह भी बताया गया कि पूर्व न्यायिक आदेश के Review के बाद धारा 32 के तहत विवाद पर विचार करने का स्पष्ट आधार मौजूद है।

हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

जयदीप की ओर से यह तर्क दिया गया था कि Assistant Registrar ने धारा 32 के तहत जांच शुरू करने से पहले आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया और 7 मई 2025 का आदेश निरस्त किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि समाज के चुनाव विधिवत हुए हैं।

लेकिन हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि Assistant Registrar के पास Suo Motu Inquiry शुरू करने की आवश्यक शक्ति है और जांच शुरू करने का आदेश कानून के अनुरूप है।

अब जांच के दौरान सामने रखना होगा पूरा पक्ष

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने और मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक पहलुओं पर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा। यानी अब विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण संबंधित प्राधिकरण के समक्ष होने वाली जांच है।

धर्मेंद्र वर्मा एवं अन्य प्रतिवादियों की ओर से पहले ही यह रुख न्यायालय के समक्ष रखा गया है कि मामले की जांच धारा 32 के दायरे में की जा सकती है। हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका खारिज किए जाने के बाद इस जांच को रोकने की मांग पर जयदीप को न्यायालय से राहत नहीं मिली है।

“अब दस्तावेजों के आधार पर होगा फैसला”

इस पूरे घटनाक्रम के बाद समाज के भीतर अब निगाहें धारा 32 के तहत होने वाली जांच पर टिक गई हैं। जांच के दौरान समाज के गठन, संचालन, चुनाव, वित्तीय स्थिति तथा अन्य संबंधित पहलुओं से जुड़े दस्तावेज और रिकॉर्ड जांच के दायरे में आ सकते हैं। धारा 32 के तहत सक्षम प्राधिकारी को समाज की पुस्तकों, खातों, दस्तावेजों, संपत्तियों आदि के संबंध में जांच करने तथा आवश्यक व्यक्तियों से जानकारी लेने की शक्तियां प्राप्त हैं।

हालांकि हाईकोर्ट ने वर्तमान आदेश में इन मूल विवादित तथ्यों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। न्यायालय ने केवल यह तय किया है कि Assistant Registrar द्वारा धारा 32 के तहत जांच प्रारंभ करना वैधानिक रूप से अधिकार क्षेत्र के भीतर है।

धर्मेंद्र वर्मा एवं अन्य के पक्ष को मिली मजबूती

इस फैसले को धर्मेंद्र वर्मा एवं अन्य निजी प्रतिवादियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि जिस जांच की प्रक्रिया को रोकने के लिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, उस चुनौती को न्यायालय ने खारिज कर दिया है।

अब मामला न्यायालय में जांच रोकने की लड़ाई से आगे बढ़कर संबंधित प्राधिकरण के समक्ष दस्तावेजों और तथ्यों के परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ेगा। ऐसे में समाज से जुड़े सभी संबंधित रिकॉर्ड, दस्तावेज और तथ्यों का परीक्षण जांच प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

हाईकोर्ट ने अंततः स्पष्ट शब्दों में कहा कि Assistant Registrar की कार्रवाई में कोई मनमानी, अवैधानिकता, अनुचितता अथवा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं पाया गया और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। इसी आधार पर जयदीप की रिट याचिका खारिज कर दी गई।

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