समर्पण ही संगठन को मजबूत करता है, गुप्ता होना आसान नहीं

Spread the love

भोपाल की सुबह का एक अलग ही मिजाज होता है। शहर पूरी तरह जागा भी नहीं होता, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी दिनचर्या सूरज से पहले शुरू हो जाती है।

सड़कों पर हल्की हलचल, चाय की दुकानों से उठती भाप, और इन्हीं सबके बीच एक सादा सा दृश्य कुर्ता-पजामा पहने, मोटरसाइकिल पर सवार एक व्यक्ति, जो बिना किसी शोर-शराबे के अपने काम पर निकल पड़ा है। यह दृश्य कोई एक दिन का नहीं, बल्कि वर्षों से चलता आ रहा एक क्रम है। यह कहानी है ऐसे ही एक कार्यकर्ता की राजेन्द्र गुप्ता जिनके लिए संगठन केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है।

आज जब राजनीति का अर्थ अक्सर पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव से जोड़ा जाता है, तब गुप्ता जैसे लोग इस धारणा को चुनौती देते हैं। वे उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जहां सेवा सर्वोपरि होती है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा गौण। भोपाल के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में उनकी पहचान किसी पद या कुर्सी से नहीं, बल्कि उनके समर्पण, सादगी और निरंतर सक्रियता से बनी है।

गुप्ता का जीवन किसी अचानक मिली पहचान की कहानी नहीं है। यह वर्षों की तपस्या, अनुशासन और विचारधारा के प्रति अटूट विश्वास का परिणाम है। उनका सफर बजरंग दल से शुरू होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और फिर व्यापक संगठनात्मक ढांचे तक पहुंचा, लेकिन इस यात्रा में एक बात हमेशा स्थिर रही उन्होंने कभी भी राजनीति को व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं बनने दिया। न तो उन्होंने किसी पद की लालसा रखी, और न ही कभी कुर्सी के लिए संघर्ष किया। उनका एक ही लक्ष्य रहा संगठन को मजबूत करना।

ऐसे समय में, जब कई लोग संगठन को सीढ़ी बनाकर व्यक्तिगत ऊंचाइयों तक पहुंचना चाहते हैं, गुप्ता जैसे लोग उस नींव की तरह होते हैं, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी इमारत को मजबूती देती है। वे उन कार्यकर्ताओं में से हैं जो मंच पर कम और मैदान में ज्यादा दिखाई देते हैं। वे भाषणों से ज्यादा कर्म में विश्वास रखते हैं।

लेखक के रूप में मेरा व्यक्तिगत अनुभव इस कहानी को और गहराई देता है। महज 12 वर्ष की उम्र में मैं, चक्की चौराहे पर नारे लगाया करता था। वह उम्र खेलने-कूदने की होती है, लेकिन उस समय विचारधारा का बीज मन में पड़ चुका था। वहीं से संगठन के प्रति जुड़ाव शुरू हुआ। उन दिनों राजेन्द्र गुप्ता जैसे कार्यकर्ताओं को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला।

इसके बाद साढ़े छ नंबर बस स्टॉप पर होने वाली बैठकों में शामिल होना, संगठन की कार्यप्रणाली को समझना, और जमीनी स्तर पर काम करने की बारीकियां सीखना यह सब मेरे जीवन का हिस्सा बन गया। गुप्ता उन लोगों में से थे, जो बिना किसी औपचारिकता के सिखाते थे। वे न तो बड़े-बड़े भाषण देते थे, और न ही किसी प्रकार का दिखावा करते थे। उनका पूरा ध्यान केवल काम पर होता था।

राम मंदिर आंदोलन के समय गुप्ता की सक्रियता विशेष रूप से देखने लायक थी। जब देशभर में इस मुद्दे को लेकर एक लहर थी, तब भोपाल में गुप्ता अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आते थे। उन्होंने न केवल खुद भागीदारी निभाई, बल्कि अनेक कार्यकर्ताओं को भी प्रेरित किया। यह उनकी नेतृत्व क्षमता और संगठन के प्रति उनके समर्पण का स्पष्ट प्रमाण है।

गुप्ता की सबसे बड़ी ताकत है उनका लोगों से जुड़ाव। भोपाल की गलियों में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो उन्हें न जानता हो। यह पहचान उन्होंने किसी प्रचार या दिखावे से नहीं बनाई, बल्कि वर्षों की सेवा, सरलता और निरंतर उपस्थिति से अर्जित की है। वे हर वर्ग के लोगों के बीच सहजता से घुल-मिल जाते हैं चाहे वह बच्चा हो, युवा हो या बुजुर्ग।

उनके लिए संगठन का मतलब केवल बैठकों और योजनाओं तक सीमित नहीं है। वे इसे एक जीवंत व्यवस्था मानते हैं, जिसमें हर कार्यकर्ता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जरूरतमंदों की मदद करना, किसी कार्यकर्ता की समस्या का समाधान निकालना, या फिर किसी सामाजिक मुद्दे पर तुरंत सक्रिय हो जाना ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं।

गुप्ता ने केवल खुद को ही नहीं गढ़ा, बल्कि अनेक युवाओं को भी दिशा दी है। उनसे प्रेरणा लेकर कई कार्यकर्ता आज संगठन में उच्च पदों पर पहुंचे हैं। लेकिन यह विडंबना ही है कि दूसरों को ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला यह व्यक्ति खुद आज भी उसी सादगी के साथ जीवन जी रहा है। न कोई विशेष सुविधा, न कोई दिखावा सिर्फ काम और समर्पण।

आज भी जब आप उन्हें देखते हैं, तो वही पुराना दृश्य सामने आता है मोटरसाइकिल पर सवार, हाथ में पर्चे, और चेहरे पर वही सहज मुस्कान। वे मीडिया को पर्चे बांटते हैं, लोगों से मिलते हैं, और हर दिन संगठन को मजबूत करने में जुटे रहते हैं। उनके लिए यह कोई दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।

राजनीति में आज जिस तरह से अवसरवादिता और दिखावा बढ़ रहा है, उसमें गुप्ता जैसे लोग एक अलग ही पहचान बनाते हैं। वे यह सिखाते हैं कि असली ताकत पद में नहीं, बल्कि समर्पण में होती है। संगठन की मजबूती ऐसे ही कार्यकर्ताओं पर निर्भर करती है, जो बिना किसी स्वार्थ के लगातार काम करते रहते हैं।

गुप्ता का जीवन यह भी सिखाता है कि सच्चा कार्यकर्ता वही होता है, जो हर परिस्थिति में संगठन के साथ खड़ा रहे। चाहे समय अनुकूल हो या प्रतिकूल, वह अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटता। यही कारण है कि गुप्ता आज भी संगठन के एक मजबूत स्तंभ के रूप में देखे जाते हैं।

मेरे लिए यह केवल एक संपादकीय नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत अनुभव की अभिव्यक्ति भी है। मैंने उन्हें करीब से देखा है, उनके साथ समय बिताया है, और उनसे बहुत कुछ सीखा है। मेरी अपनी यात्रा, जो चक्की चौराहे पर नारे लगाने से शुरू हुई, उसमें गुप्ता जैसे कार्यकर्ताओं की प्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान है।

यह कहानी केवल राजेन्द्र गुप्ता की नहीं है, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं की भी है, जो बिना किसी पहचान या अपेक्षा के संगठन के लिए काम कर रहे हैं। वे न तो सुर्खियों में आते हैं, और न ही मंचों पर सम्मानित होते हैं, लेकिन उनकी मेहनत और समर्पण ही संगठन की असली ताकत होती है।

गुप्ता होना सच में आसान नहीं है। इसके लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। यह एक ऐसा मार्ग है, जिसमें व्यक्तिगत इच्छाओं को त्यागकर सामूहिक हित को प्राथमिकता देनी होती है।

आज के युवाओं के लिए गुप्ता एक जीवंत प्रेरणा हैं। वे यह सिखाते हैं कि अगर आप सच में समाज और संगठन के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो आपको बिना किसी अपेक्षा के काम करना होगा। सफलता अपने आप आपके पीछे आएगी।

यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर संगठन एक मजबूत किला है, तो गुप्ता जैसे कार्यकर्ता उसकी वह नींव हैं, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी संरचना को संभाले रखती है। वे वह शक्ति हैं, जो संगठन को भीतर से मजबूत बनाती है।

भारत माता की जय।
वीर तुम बढ़े चलो, संगठन गढ़े चलो।

admin1

admin1

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *