मुंबई: भारत रिन्यूएबल एनर्जी को बढावा देने और बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अपने पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क का तेज़ी से विस्तार कर रहा है। ऐसे में आने वाले सालों में एल्युमीनियम की मांग में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, और विभिन्न इलेक्ट्रिकल ऐप्लीकेशन्स में इस धातु की खपत तेज़ी से बढ़ेगी।
माइंस मिनिस्ट्री के एल्युमीनियम विज़न डॉक्यूमेंट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 24 में विद्युत क्षेत्र में एल्युमीनियम की खपत लगभग 2.4 मिलियन टन थी जो वित्तीय वर्ष 30 तक बढ़कर 4 मिलियन टन और फिर वित्तीय वर्ष 47 तक 12.9 मिलियन टन पहुंचने का अनुमान है। ये अनुमान धातु की मांग बढ़ाने में इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर का बढ़ते महत्व को इंगित करते हैं।
यह मौका खास तौर पर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर के लिए मायने रखता है, जो पहले से ही देश में एल्युमीनियम की खपत का एक बड़ा हिस्सा बनाता है। भारत में इस्तेमाल होने वाले एल्युमीनियम का लगभग 48 फीसदी हिस्सा बिजली के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में इस्तेमाल होता है, जो देश के बिजली नेटवर्क में इस धातु की अहम भूमिका को दिखाता है।
उम्मीद है कि भारत में ट्रांसमिशन की बढ़ती ज़रूरतों से यह मांग और अधिक बढ़ेगी। नेशनल इलेक्ट्रिसिटी प्लान के तहत, 2032 तक देश के ट्रांसमिशन नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार करने और कई लाख करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना है। इस विस्तार का उद्देश्य रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देना, विभिन्न क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को मज़बूत बनाना और नए इंडस्ट्रियल और इकोनॉमिक सेंटरों की मांग को पूरा करना है।
ट्रांसमिशन में निवेश का यह चक्र बहुत बड़े पैमाने पर है। नेशनल इलेक्ट्रिसिटी प्लान (2023-2032) के तहत ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में रु 9.15 लाख करोड़ से अधिक निवेश की योजना है। इसमें 1.91 लाख सर्किट किलोमीटर से ज़्यादा नई ट्रांसमिशन लाइनें और लगभग 1,270 जीवीए की ट्रांसफॉर्मेशन क्षमता शामिल है। इसका मुख्य उद्देश्य रिन्यूएबल एनर्जी के लिए इवैक्यूएशन कॉरिडोर बनाना है, जिसके तहत 2030 तक ट्रांसमिशन सिस्टम में 500 गीगावॉट से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता बढ़ाने की योजना है। ये निवेश विभिन्न क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी को मज़बूत करेंगे और बिजली को रिन्यूएबल एनर्जी वाले क्षेत्रों से नए खपत केंद्रों तक पहुँचाने में मदद करेंगे।
ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में एल्युमीनियम का इस्तेमाल बहुत अधिक होता है। हालांकि असल खपत वोल्टेज के स्तर, कंडक्टर के डिज़ाइन और इस बात पर निर्भर करती है कि लाइन में सिंगल कंडक्टर का इस्तेमाल हो रहा है या बंडल कंडक्टर का। नई ट्रांसमिशन क्षमता के हर 10,000 सर्किट किलोमीटर के लिए लगभग 36,000 टन एल्युमीनियम की ज़रूरत हो सकती है (220 किलोवॉट सिंगल-ज़ेबरा कॉन्फ़िगरेशन में), इसी तरह 400 किलोवॉट ट्विन-मूस कॉन्फ़िगरेशन में लगभग 88,000 टन, या 765 किलोवॉट फोर-बंडल कॉन्फ़िगरेशन में लगभग 176,000 टन की ज़रूरत होती है।
ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के बढ़ने का सीधा असर एल्युमीनियम की खपत पर पड़ता है क्योंकि ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइनें ज़्यादातर एल्युमीनियम-बेस्ड कंडक्टर पर निर्भर करती हैं। इलेक्ट्रिकल केबल में इस्तेमाल होने पर कॉपर भारी होता है और लंबी दूरी तक फैले होने पर उसके लटकने (सैगिंग) की संभावना ज़्यादा होती है, जबकि एल्युमीनियम हल्का होता है और कम लटकता है, जिससे यह बिजली ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए एक बेहतर विकल्प बन जाता है।
एल्युमीनियम में इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी, कम वज़न और मज़बूती का अच्छा तालमेल होता है, जो इसे लंबी दूरी तक बिजली पहुँचाने के लिए खास तौर पर उपयुक्त बनाता है। इलेक्ट्रिकल ग्रेड एल्युमीनियम वायर रॉड, पूरे पावर नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाले केबल और कंडक्टर बनाने के लिए एक ज़रूरी इनपुट हैं। इस मांग का दायरा पारंपरिक ग्रिड विस्तार से कहीं आगे तक बढ़ने की उम्मीद है।
भारत तेज़ी से बड़े खपत केंद्रों से दूर रिन्यूएबल एनर्जी उत्पन्न करने की क्षमता विकसित कर रहा है, ऐसे में इन केन्द्रों से बिजली को दूसरे स्थानों तक पहुंचाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत पैदा हो रही है। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन हाइड्रोजन और डेटा सेंटर जैसे नए क्षेत्रों से भी बिजली की मांग बढ़ रही है। ये सभी ट्रेंड मिलकर बिजली पैदा करने और उसे कुशलतापूर्वक पहुँचाने के लिए ज़रूरी ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, दोनों की मांग बढ़ा रहे हैं।
भारत के एल्युमीनियम उद्योग के लिए, यह कंस्ट्रक्शन, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स से होने वाली पारंपरिक मांग के अलावा विकास का एक बड़ा नया ज़रिया बन सकता है। यह मौका वैल्यू-एडेड एल्युमीनियम उत्पादों, खासकर बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उत्पादों की ओर भी ध्यान खींच रहा है।
इंटीग्रेटेड एल्युमीनियम और डाउनस्ट्रीम क्षमताओं वाले घरेलू उत्पादक इस बदलाव का फ़ायदा उठाने के लिए अच्छी स्थिति में हैं। भारत के प्रमुख एल्युमीनियम उत्पादकों में से एक, वेदांता की एल्युमीनियम उत्पादन क्षमता लगभग 2.4 मिलियन टन है और यह वायर रॉड, बिलेट, इनगॉट और रोल्ड उत्पादों सहित कई तरह के वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाती है। वेदांता एल्युमीनियम वायर रॉड की दुनिया की सबसे बड़ी उत्पादक भी है, जो पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन को सपोर्ट करने वाली मूल्य श्रृंखला में उसकी स्थिति को मज़बूत करती है। कंपनी ने अपने एल्युमीनियम प्रोडक्ट्स में इलेक्ट्रिकल ग्रेड वायर रॉड्स को शामिल किया है, जिनका इस्तेमाल केबल और कंडक्टर जैसे कामों में होता है। इससे कंपनी बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति को मजबूत बना सकती है।
वेदांता एल्युमिनियम टारगेट (Vedanta Aluminium Share Target)
| ब्रोकरेज | रेटिंग | वर्तमान भाव | टारगेट प्राइस | टाइम फ्रेम | पोटेंशियल रिटर्न (%) |
| Systematix | Buy | ₹435 | ₹598 | 12 महीने | +37.47% |
| Nuvama | Buy | ₹435 | ₹540 | 12 महीने | +24.14% |
| MOSL | Buy | ₹435 | ₹540 | 12 महीने | +24.14% |
| ICICI Securities | Buy | ₹435 | ₹520 | 12 महीने | +19.54% |
| Geojit | Buy | ₹435 | ₹498 | 12 महीने | +14.48% |
इस अवसर पर वेदांता के एक प्रवक्ता ने कहा, “भारत का पावर ट्रांजिशन तेज़ी से एक इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी बन रहा है और ट्रांसमिशन इसका मुख्य हिस्सा होगा। रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन बढ़ने के साथ बिजली की मांग वाले नए केंद्र बन रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में देश भर में भरोसेमंद तरीके से बिजली पहुँचाने की क्षमता भी उतनी ही ज़रूरी हो जाएगी जितनी कि बिजली पैदा करना। इससे एल्युमीनियम और इलेक्ट्रिकल ग्रेड वायर रॉड्स जैसे वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स के लिए एक बड़ा मौका बन रहा है। वेदांता में, हम इस मूल्य श्रृंखला को मज़बूत बनाने और एक बेहतर कनेक्टेड और मज़बूत पावर सिस्टम के लिए भारत के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करने पर ध्यान दे रहे हैं।”
भारत में ट्रांसमिशन और ग्रिड के आधुनिकीकरण में लगातार निवेश किया जा रहा है। ऐसे में, एल्युमीनियम को अब सिर्फ़ कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाली धातु के बजाय, देश के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार को सपोर्ट करने वाले एक अहम मटीरियल के तौर पर देखा जा सकता है।
इसके मायने स्पष्ट हैंः रिन्यूएबल एनर्जी का ज़्यादा उत्पादन, बिजली की बढ़ती मांग और बड़े ट्रांसमिशन नेटवर्क की वजह से ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत बढ़ रही है। इससे एल्युमीनियम की मांग में लगातार बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे घरेलू उत्पादकों को विकास का नया मौका मिलेगा और साथ ही भारत के बड़े एनर्जी ट्रांजिशन में भी मदद मिलेगी।
