भारत में पारंपरिक अपराधों में 6% की गिरावट, सुरक्षा से मिला बड़ा आर्थिक लाभ: एसबीआई इकोरैप रिपोर्ट

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  • साल 2024 में राष्ट्रीय अपराध दर 448.3 से घटकर 418.9 प्रति लाख आबादी हुई; महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 1.5% की कमी। PDF
  • डिजिटलीकरण के कारण अपराधियों के तौर-तरीकों में बदलाव; साइबर अपराध के मामलों में 17% की भारी बढ़ोतरी। PDF
  • एसबीआई रिसर्च ने सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के बीच स्थापित किया सीधा संबंध: अपराध में 1% की कमी से अल्पावधि वास्तविक जीडीपी में 0.11% का सुधार। PDF
  • रिपोर्ट में अपराधों को दर्ज न करने (अंडररिपोर्टिंग) पर जताई गई चिंता; घरेलू हिंसा के मामलों में करीब 4.73 लाख मामलों में एफआईआर दर्ज न होने का अनुमान। PDF

मुंबई : भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की नवीनतम इकोरैप रिपोर्ट (इश्यू नंबर 11, वित्त वर्ष 27) के अनुसार, वर्ष 2024 में देश के सभी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल संज्ञेय अपराधों (cognizable crimes) में सालाना आधार पर 6.0% की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। “क्राइम डाउन, डिविडेंड्स अप!” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट के मुताबिक, अखिल भारतीय अपराध दर प्रति लाख आबादी पर 448.3 से घटकर 418.9 पर आ गई है। वर्ष 2024 में दर्ज कुल 58.86 लाख मामलों में से 35.45 लाख मामले भारतीय दंड संहिता (IPC)/भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत और 23.42 लाख मामले विशेष और स्थानीय कानूनों (SLL) के तहत दर्ज किए गए थे। राज्यों में केरल में प्रति लाख 1,389 मामलों के साथ सबसे अधिक अपराध दर रही, जबकि नागालैंड में यह दर सबसे कम यानी प्रति लाख 61.6 दर्ज की गई।

सकारात्मक पहलू यह है कि देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में 1.5% की कमी आई है, जो 2023 के 4.48 लाख मामलों से घटकर 2024 में 4.41 लाख मामले रह गए हैं। हालांकि, इसके समानांतर अपराधियों का रुख डिजिटल स्पेस की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। साल 2024 में साइबर अपराधों में 17% की तेज बढ़त देखी गई, जो 2023 के 86,420 मामलों से बढ़कर 1 लाख मामलों के आंकड़े को पार कर गई है

अपराधों में कमी के मुख्य कारण

एसबीआई रिसर्च ने पारंपरिक अपराधों में आई इस गिरावट के पीछे सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure), उन्नत निगरानी तंत्र और डिजिटलीकरण को मुख्य कारण माना है:

  • सार्वजनिक पूंजीगत व्यय: राज्यों के विश्लेषण से पता चलता है कि प्रति व्यक्ति सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में 1% की वृद्धि होने से अपराध दर में लगभग 0.36% की कमी आती है। ‘सेफ सिटी प्रोजेक्ट’ जैसी पहलों के माध्यम से शहरों में सीसीटीवी, जीआईएस-आधारित मैपिंग और बेहतर लाइटिंग बुनियादी ढांचे में किए गए निवेश ने अपराधों को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई है। PDF+ 1
  • सीसीटीवी निगरानी: शहरों के स्तर पर किए गए अध्ययन में सीसीटीवी डेंसिटी (प्रति वर्ग मील कैमरों की संख्या) और अपराध दर में गिरावट के बीच -0.148 का नकारात्मक संबंध पाया गया है। ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ के तहत 100 स्मार्ट शहरों में 84,000 से अधिक सीसीटीवी कैमरे, 1,884 आपातकालीन कॉल बॉक्स और 3,000 पब्लिक एड्रेस सिस्टम लगाए गए हैं। चेन्नई प्रति वर्ग मील 615 कैमरों के साथ देश में सबसे आगे है, जिसके बाद हैदराबाद (157) और मुंबई (145) का स्थान है। PDF+ 2
  • डिजिटलीकरण की भूमिका: यूपीआई (UPI), फास्टैग (FASTag) और डिजिटल सर्विलांस जैसे उपकरणों ने अपराधियों के छिपने या गुमनाम रहने के अवसरों को बेहद कम कर दिया है। इससे अपराधियों के पकड़े जाने की संभावना बढ़ गई है और अपराध करने की संभावित लागत में भारी इजाफा हुआ है। PDF+ 1

सुरक्षा से मिलने वाला ‘आर्थिक लाभांश’

रिपोर्ट में एक विशेष डायनेमिक मॉडल के जरिए यह साबित किया गया है कि कानून-व्यवस्था सिर्फ एक प्रशासनिक विषय नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। आंकड़ों के अनुसार, अपराध दर (IPC/BNS) में 1% की गिरावट आने से देश की वास्तविक जीडीपी (Real GDP) विकास दर में अल्पावधि में करीब 0.11% की बढ़ोतरी होती है, जबकि दीर्घकालिक स्तर पर यह सकारात्मक प्रभाव बढ़कर 0.13% तक पहुंच जाता है

इसके विपरीत, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध श्रम बाजार (Labour Market) में एक बड़ी बाधा के रूप में काम करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, वहां महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (LFPR) काफी कम या मध्यम स्तर पर है। हरियाणा, केरल, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में महिला सुरक्षा की स्थिति सीधे तौर पर उनकी गतिशीलता, रोजगार के विकल्पों और कार्यस्थल तक पहुंच को प्रभावित कर रही है

अंडररिपोर्टिंग और एफआईआर (FIR) न दर्ज होने की गंभीर चिंता

अपराधों के कुल आंकड़ों में गिरावट के बावजूद, रिपोर्ट ने जमीन पर होने वाले अपराधों और पुलिस रिकॉर्ड के बीच एक बड़ा अंतर उजागर किया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़ों की तुलना जब एनसीआरबी (NCRB) के आधिकारिक आंकड़ों से की गई, तो घरेलू हिंसा (पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के मामलों में भारी अंडररिपोर्टिंग सामने आई। सर्वेक्षण के अनुसार, देश में लगभग 24.0% विवाहित महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का सामना करती हैं, जिसका सालाना बोझ लगभग 6.69 करोड़ महिलाओं पर है। सहायता प्राप्त करने के रुझानों के आधार पर, इनमें से कम से कम 5.94 लाख मामले पुलिस तक पहुंचने चाहिए थे, लेकिन एनसीआरबी 2024 के रिकॉर्ड में केवल 1.21 लाख पीड़ित ही दर्ज किए गए। इसका मतलब यह है कि संभावित मामलों में से केवल 20.4% ही पुलिस रिकॉर्ड में आ पाते हैं, और लगभग 4.73 लाख मामले ऐसे हैं जिनमें एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती है

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल को एक ऐसे राज्य (आउटलायर) के रूप में चिन्हित किया गया है, जहां कुछ विशेष श्रेणियों में मामलों को दर्ज न किए जाने की प्रबल आशंका है। पश्चिम बंगाल की आबादी बड़ी है और वहां गंभीर अपराधों जैसे—गुमशुदा बच्चे (देश का 16.11%), अपहरण (8.03%) और महिलाओं के खिलाफ अपराधों (7.78%) की राष्ट्रीय हिस्सेदारी बहुत अधिक है। इसके विपरीत, संपत्ति से जुड़े अपराधों में राज्य की हिस्सेदारी असामान्य रूप से कम है; देश में होने वाली कुल चोरियों में पश्चिम बंगाल का हिस्सा सिर्फ 1.49% और सेंधमारी (burglary) में महज 0.06% है। पूरे राज्य में दर्ज 15,969 संपत्ति अपराधों में से केवल 53 रात की सेंधमारी के मामले दिखाए गए हैं। तुलनात्मक रूप से, कम आबादी वाले पड़ोसी राज्य झारखंड में इन श्रेणियों के तहत कहीं अधिक मामले दर्ज हैं। यह विरोधाभास साफ तौर पर दर्शाता है कि कुछ राज्य भले ही कम अपराध दर दर्ज होने का जश्न मनाएं, लेकिन हकीकत में यह कमी अपराधों के खत्म होने से नहीं, बल्कि पुलिस में एफआईआर दर्ज न होने के कारण हो सकती है

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