मेघा गोयल, सीएचआरओ, गोदरेज प्रॉपर्टीज लिमिटेड
आइए, सोशल मीडिया की हलचल भरी दुनिया में चलते हैं। सोशल मीडिया पर सजी-संवरी जिंदगी हर तरफ दिखाई देती है। स्क्रॉल कीजिए। लाइक कीजिए। शेयर कीजिए और फिर दोहराइए। बेहतरीन तस्वीरें और खुशियों से भरे पल। ऐसी दिनचर्या, जिसमें सब कुछ बेहद आसान नजर आता है।
हममें से बहुत से लोगों के लिए यह सिलसिला काम का दिन शुरू होने से काफी पहले शुरू हो जाता है और काम खत्म होने के बाद भी चलता रहता है। डेडलाइन और काम की जिम्मेदारियों के बीच सोशल मीडिया रील्स की अंतहीन दुनिया है—सूर्यास्त के समय योग, खूबसूरती से सजे होम ऑफिस, करियर में मिली ‘आसानी से हासिल’ होने वाली सफलताएं। ये सभी मिलकर हमें कहीं न कहीं यह एहसास कराते हैं कि ‘आप पर्याप्त नहीं कर रहे हैं।’
जब कर्मचारी पहले से ही काम के दबाव में हों, तो सोशल मीडिया पर दूसरों से की जाने वाली यह तुलना उनके भीतर कमी या असफलता की भावना को और बढ़ा सकती है। लेकिन असली कहानी इस बात की नहीं है कि लोग सोशल मीडिया पर क्या देख रहे हैं। असली सवाल यह है कि हर दिन काम पर पहुंचने के बाद वे कैसा महसूस करते हैं। उनके संघर्ष, आत्म-संदेह और उन उपलब्धियों के पीछे की मेहनत अक्सर दिखाई नहीं देती।
‘वर्कप्लेस डिस्क्रिमिनेशन रिपोर्ट’ के अनुसार, 76% कर्मचारी अपनी बात खुलकर कहने में सुरक्षित महसूस करते हैं, जिसका मतलब है कि हर चार में से एक कर्मचारी चुप रहता है। जब कर्मचारियों को पहले से ही लगता है कि उनकी आवाज की कोई अहमियत नहीं है, तो इंटरनेट पर दूसरों की सजी-धजी सफलता देखकर उन्हें और अधिक लगने लगता है कि वे पीछे छूट रहे हैं। यह स्थिति एक ऐसा चक्रव्यूह बना देती है जो कार्यक्षमता और मानसिक मजबूती दोनों को खत्म कर देती है।
इसीलिए कर्मचारी कल्याण को केवल योजनाओं या सुविधाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह रोजमर्रा की कार्य-संस्कृति और नेतृत्व के व्यवहार से तय होता है। कार्यस्थल पर कल्याण की बुनियाद तीन सरल लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बातों पर टिकी है—कर्मचारी को महसूस हो कि उसे देखा और समझा जा रहा है, उसकी बात सुनी जा रही है और जरूरत के समय उसे सहयोग मिल रहा है।
अन्य क्षेत्रों की तरह, रियल एस्टेट कंपनियां भी अब यह समझने लगी हैं कि आज के दौर में कर्मचारियों की वेलबीइंग को काम से अलग नहीं रखा जा सकता। इसका समाधान वेलबीइंग को कंपनी की बुनियादी रणनीतियों का हिस्सा बनाने में है। इन प्रयासों के केंद्र में कंपनियों को सबसे पहले सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी—सिर्फ शारीरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सुरक्षा भी। अग्रणी कंपनियां अपने वर्कप्लेस कल्चर पर दोबारा विचार कर रही हैं और ऐसी पहल कर रही हैं जो सीधे तौर पर काम से जुड़ी और भावनात्मक ज़रूरतों को पूरा करती हैं—जैसे काम में लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी), वर्क-लाइफ बैलेंस और करियर में तरक्की से जुड़ी नीतियां। इसके साथ ही, वे महिलाओं, अलग-अलग उम्र के लोगों, विभिन्न पृष्ठभूमियों और दिव्यांगजनों की भागीदारी और समावेशन को मजबूत करने के लिए डेटा-आधारित समझ पर काम कर रही हैं।
यहाँ यह सवाल पूछना ज़रूरी है: क्या कर्मचारियों को यह महसूस होता है कि वे जैसे हैं और जो योगदान दे रहे हैं, उसके लिए उन्हें पहचाना जा रहा है? क्या मुश्किल या कमज़ोर पलों में उनकी बात सुनी जाती है? और जब ज़िंदगी कठिन हो जाती है, तो क्या उन्हें सहारा मिलता है?
मूल रूप से, कार्यस्थल पर वेलबीइंग तीन सीधे लेकिन बेहद असरदार आधारों पर टिकी है: पहचाना जाना, सुना जाना और सहारा मिलना।
इस पूरे सफर में दिखावे का दबाव भी रहेगा, लेकिन अंततः प्रामाणिकता (सच्चाई) ही किसी संस्थान के कल्चर को तय करती है।
देखा और समझा जाना
किसी कर्मचारी को ‘देखना’ केवल उसकी मौजूदगी को नोटिस करना नहीं है। इसका मतलब है उसके योगदान को पहचानना, उसकी परवाह करना और उसके साथ लगातार एक जैसा व्यवहार करना।
कर्मचारियों को तब लगता है कि उन्हें महत्व दिया जा रहा है, जब केवल उनके नतीजों की नहीं, बल्कि उनकी मेहनत को भी पहचाना जाता है। जब मैनेजर किसी कर्मचारी की प्रगति, उसके इरादे और मुश्किल परिस्थितियों में उसकी मजबूती को समझते हैं, तो कर्मचारी खुद को महत्वपूर्ण महसूस करता है।
आभार जताने वाली कार्य-संस्कृति का भी बहुत महत्व है। उपलब्धियों का जश्न केवल बड़ी सफलताओं या महत्वपूर्ण पड़ावों तक सीमित नहीं होना चाहिए। छोटी-छोटी जीत, चुपचाप की गई मेहनत और पर्दे के पीछे रहकर किए गए योगदान को भी उतनी ही अहमियत मिलनी चाहिए।
जब लोगों को लगता है कि उन्हें कोई देख या पहचान नहीं रहा है, तो वे धीरे-धीरे काम से दूर होने लगते हैं। इसके विपरीत, जब उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत और योगदान को पहचाना जा रहा है, तो संगठन के प्रति जुड़ाव और अपनापन बढ़ता है।
अपनी बात कह पाना
कर्मचारी की बात सुनी जाना केवल उसे बोलने का मौका देना नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि वह बिना किसी डर के अपनी बात रख सके। कर्मचारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी राय मायने रखती है और अपनी बात रखने पर उन्हें किसी नकारात्मक परिणाम का सामना नहीं करना पड़ेगा।
संगठनों को सिर्फ फीडबैक लेने के लिए नहीं, बल्कि उस पर कार्रवाई करने के इरादे से सुनना चाहिए।
इसके लिए ऐसा माहौल बनाना जरूरी है, जहां लोग बिना झिझक अपने विचार, चिंताएं और मुश्किल परिस्थितियां साझा कर सकें। इसमें नेताओं और मैनेजरों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें खुद खुलेपन का उदाहरण पेश करना होगा।
जब नेता असहमति को जगह देते हैं, अपनी सीमाओं या अनिश्चितताओं को स्वीकार करते हैं और कर्मचारियों की बात पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया देते हैं, तो आपसी भरोसा मजबूत होता है।
कर्मचारियों की बात सुने जाने से उनमें जिम्मेदारी और संगठन के प्रति अपनापन बढ़ता है। वे अधिक सक्रिय होकर भाग लेते हैं और ऐसी कार्य-संस्कृति बनती है जहां ईमानदारी से बात करने को सजा नहीं, बल्कि सम्मान मिलता है।
सहयोग मिलना
सहयोग वह कड़ी है जो संगठन के मूल्यों को व्यवहार में बदलती है। कर्मचारी कल्याण को बढ़ावा देने में नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। काम में लचीलापन, मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायता, छुट्टियों से जुड़ी बेहतर व्यवस्थाएं और करियर में आगे बढ़ने के स्पष्ट अवसर—ये सभी इस बात का संकेत देते हैं कि संगठन वास्तव में अपने कर्मचारियों की परवाह करता है।
लेकिन कर्मचारी को सहयोग का सबसे मजबूत एहसास उसके मैनेजर से होता है। मानसिक रूप से सुरक्षित माहौल बनाने, तनाव और थकान के शुरुआती संकेतों को पहचानने और संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देने की मैनेजर की क्षमता कर्मचारी के अनुभव को काफी हद तक तय करती है।
सहयोग का मतलब यह भी है कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर बातचीत को सामान्य बनाया जाए और यह स्वीकार किया जाए कि कर्मचारी अपने जीवन के पूरे अनुभव के साथ काम पर आता है।
जब टीमें बिना किसी डर के अपनी परेशानियां और दुविधाएं साझा कर पाती हैं, तो आपसी जुड़ाव और मजबूत होता है। जब खुशियां और उपलब्धियां खुले तौर पर साझा की जाती हैं और छोटी-बड़ी हर सफलता को पहचान मिलती है, तो टीम के सदस्यों के बीच जुड़ाव बढ़ता है।
इस व्यवस्था को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए संगठनों को यह भी दोबारा सोचना होगा कि वे किन चीजों को मापते हैं। उत्पादकता और कर्मचारी जुड़ाव के आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते। कर्मचारियों के तनाव और थकान, संगठन के प्रति भरोसे और मानसिक सुरक्षा जैसे संकेतक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इन आंकड़ों और संकेतों से नेताओं को समस्याओं की शुरुआत में ही हस्तक्षेप करने और ज्यादा स्वस्थ कार्यस्थल बनाने में मदद मिलती है।
ये उपाय उस चुपचाप बढ़ते दबाव को कम करने में मदद करते हैं, जो सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना करने की संस्कृति से पैदा होता है। साथ ही, इससे अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचार रखने वाले लोगों को अपनी बात रखने, योगदान देने और मिलकर काम करने के लिए बेहतर जगह मिलती है।
संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—एक प्रामाणिक और भरोसेमंद कार्य-संस्कृति बनाना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना टिकाऊ रियल एस्टेट तैयार करना।
ऐसी दुनिया में, जहां अक्सर पूर्णता और परफेक्शन को ही सफलता के रूप में पेश किया जाता है, कार्यस्थल को ऐसा स्थान बनना चाहिए जहां लोग बिना किसी दिखावे के अपने वास्तविक रूप में रह सकें। ऐसी जगह, जहां कर्मचारी कभी-कभार नहीं, बल्कि हर दिन यह महसूस करें कि उन्हें देखा और समझा जा रहा है, उनकी बात सुनी जा रही है और जरूरत के समय उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा है।
