आठ देशों की यात्रा के बाद एक पत्रकार की नज़र से—अनुशासन और आत्मीयता के बीच बसे दो सामाजिक संसारों की कहानी
दुनिया की गलियों में चलते हुए, भारत को नए सिरे से समझा
विदेशी नगरों की व्यवस्था और भारतीय मोहल्लों की जीवंतता—दोनों के बीच छिपे समाज के असली चरित्र की पड़ताल।
जहाँ सड़कें खत्म होती हैं, वहाँ समाज दिखाई देता है… यात्राओं ने सिखाया कि किसी देश की पहचान केवल उसकी सड़कों से नहीं, बल्कि उसके लोगों और रिश्तों से बनती है।
पिछले कुछ वर्षों में मुझे दुनिया के कई देशों की यात्राएँ करने का अवसर मिला। अलग-अलग महाद्वीपों, संस्कृतियों और समाजों को निकट से देखने के बाद एक बात बार-बार मन में आती रही कि दुनिया की गलियाँ केवल ईंट, पत्थर और डामर से नहीं बनतीं, वे अपने समाज का चरित्र भी अपने भीतर समेटे रहती हैं।
विदेश यात्राओं के दौरान मैंने ऐसे नगर और कस्बे देखे जहाँ सड़कें अत्यंत व्यवस्थित थीं। वहाँ का वातावरण शांत, अनुशासित और अपने निर्धारित ढर्रे पर चलने वाला था। लोग अपने समय का सम्मान करते हैं, निजी जीवन की सीमाओं का ध्यान रखते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। वहाँ की गलियों में चलते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो प्रत्येक व्यक्ति अपने दायित्वों के प्रति पूरी तरह सजग है।
इसके विपरीत जब मैं भारत लौटता हूँ तो यहाँ की गलियों का अपना ही संसार दिखाई देता है। यहाँ सुबह का आरंभ केवल सूर्योदय से नहीं होता, बल्कि अनेक आवाज़ों, गतिविधियों और मानवीय संवादों से होता है। दूधवाले की पुकार, सब्जीवाले की आवाज़, किसी घर से आती प्रार्थना, बच्चों की स्कूल जाने की तैयारी—सब मिलकर एक जीवंत वातावरण रचते हैं।
विदेशों में पड़ोसी वर्षों तक एक-दूसरे के बारे में बहुत कम जानते हैं। यह उनकी निजता का सम्मान है। वहीं भारत में पड़ोसी केवल पड़ोसी नहीं होते, वे कई बार विस्तारित परिवार की तरह बन जाते हैं। किसी नए व्यक्ति के आने पर लोग उसके बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं। कभी-कभी यह उत्सुकता अधिक भी हो जाती है, लेकिन इसके पीछे सामाजिक जुड़ाव की भावना भी छिपी रहती है।
बच्चों की दुनिया में भी यह अंतर दिखाई देता है। विकसित देशों में बच्चों के लिए सुव्यवस्थित पार्क, खेल मैदान और सुरक्षित स्थान उपलब्ध हैं। भारत में संसाधनों की सीमाओं के बावजूद बच्चे किसी भी खुली जगह को खेल का मैदान बना लेते हैं। गली क्रिकेट केवल एक खेल नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक जीवन का एक जीवंत अध्याय है।
सड़कों पर चलने वाले पशु भी हमारे सामाजिक चरित्र का हिस्सा हैं। कई देशों में सार्वजनिक व्यवस्था इतनी सुसंगठित है कि पशुओं और मनुष्यों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ दिखाई देती हैं। भारत में गाय, कुत्ते और अन्य पशु भी उसी सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बन जाते हैं जिसमें मनुष्य रहते हैं। यह दृश्य कभी चुनौती पैदा करता है तो कभी हमारे सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की झलक भी देता है।
एक और रोचक अंतर संकट की घड़ी में दिखाई देता है। विकसित देशों में लोग तत्काल और व्यवस्थित सहायता के लिए आगे आते हैं। भारत में सहायता के साथ-साथ चर्चा, सलाह और सामाजिक सहभागिता भी जुड़ जाती है। कभी-कभी यह प्रक्रिया धीमी लग सकती है, लेकिन यह हमारे सामुदायिक स्वभाव का भी परिचायक है।
स्वच्छता और सार्वजनिक व्यवस्था के क्षेत्र में विकसित देशों से हमें बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। वहाँ नियम केवल कानून की वजह से नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार के रूप में पालन किए जाते हैं। भारत भी इस दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है, किंतु अभी लंबी यात्रा शेष है, फिर भी, इन अनुभवों के बाद मैं किसी एक व्यवस्था को दूसरे से श्रेष्ठ नहीं कह सकता। दोनों के अपने-अपने गुण हैं। एक समाज हमें अनुशासन, व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्व सिखाता है। दूसरा समाज हमें मानवीय संबंधों, आत्मीयता और सामुदायिक जीवन की गर्माहट का अनुभव कराता है।
यात्राओं ने मुझे यह समझाया कि कुछ स्थान मन को प्रभावित करते हैं और कुछ हृदय को। व्यवस्थित सड़कें और शांत वातावरण बुद्धि को प्रभावित करते हैं, जबकि जीवंत गलियाँ, सहज संवाद और मानवीय रिश्ते हृदय में स्थान बना लेते हैं।
अंततः किसी देश की महानता केवल उसकी सड़कों की चौड़ाई या इमारतों की ऊँचाई से नहीं मापी जा सकती। उसकी वास्तविक पहचान उसके लोगों, उनके व्यवहार, उनके संस्कार और उनके सामाजिक संबंधों में निहित होती है। यही कारण है कि दुनिया के हर समाज के पास कुछ ऐसा है जिससे हम सीख सकते हैं, और कुछ ऐसा है जिसे हम सहेजकर अपने साथ लेकर चल सकते हैं।
