दूसरों की त्रासदी लिखने वाले पत्रकारों का दर्द कौन पढ़ता है?

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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस कल

जब कोई दुर्घटना होती है, हिंसा की घटना सामने आती है, कोई परिवार त्रासदी से गुजरता है या समाज किसी बड़े संकट का सामना करता है, तो पत्रकार वहां पहुंचता है। वह घटना देखता है, पीड़ितों से बात करता है और उनकी कहानी समाज तक पहुंचाता है। लेकिन एक सवाल शायद हम कम पूछते हैं—लगातार दूसरों की पीड़ा देखने और सुनने वाले पत्रकार के मन पर क्या गुजरती है?

पत्रकारिता केवल खबर लिखने का पेशा नहीं है। कई पत्रकार लगातार दुर्घटनाओं, हिंसा, आत्महत्या, अपराध, प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय पीड़ा से जुड़ी घटनाओं को बेहद करीब से देखते हैं। ऐसी घटनाओं का बार-बार सामना कुछ लोगों में मानसिक तनाव, बेचैनी, नींद की परेशानी या भावनात्मक थकान बढ़ा सकता है।

इसके साथ पत्रकारिता की अपनी व्यावसायिक चुनौतियां भी हैं। खबर सबसे पहले पहुंचाने का दबाव, लगातार बदलती डेडलाइन, अनियमित काम के घंटे, रात की शिफ्ट, नौकरी की अनिश्चितता और डिजिटल दौर में ऑनलाइन ट्रोलिंग जैसे तनाव एक साथ जुड़ सकते हैं।

फिर भी पत्रकारों के मानसिक स्वास्थ्य पर अपेक्षाकृत कम बातचीत होती है।

इसकी एक वजह पेशे की संस्कृति भी हो सकती है। पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि वह कठिन से कठिन घटना के बीच भी निष्पक्ष और मजबूत बना रहे। लेकिन पेशेवर रूप से मजबूत होने का अर्थ भावनात्मक रूप से अप्रभावित होना नहीं है।

जो व्यक्ति दूसरों से कठिन सवाल पूछता है, उसके लिए स्वयं यह कहना भी सहज होना चाहिए कि “मैं मानसिक रूप से ठीक महसूस नहीं कर रहा हूं और मुझे मदद चाहिए।”

न्यूज़रूम में मानसिक स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। संस्थानों को भी ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहां गंभीर घटनाओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक सहायता मिल सके। लगातार traumatic घटनाओं को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए उचित विश्राम, सहकर्मियों का सहयोग और गोपनीय मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपयोगी हो सकती है।

सहकर्मियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। किसी पत्रकार के व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव, अत्यधिक निराशा, सबसे कटना या जीवन को लेकर निरर्थकता की बातें दिखाई दें तो उन्हें केवल काम का तनाव मानकर छोड़ देना उचित नहीं है।

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर जब हम समाज के अलग-अलग वर्गों के मानसिक स्वास्थ्य की बात करते हैं, तब पत्रकारों को भी इस बातचीत में शामिल करना जरूरी है।

क्योंकि समाज की पीड़ा को शब्द देने वाले व्यक्ति के अपने दर्द को भी सुनने की जगह मिलनी चाहिए।

दूसरों की कहानी दुनिया तक पहुंचाने वाले पत्रकार से कभी-कभी हमें भी पूछना चाहिए

आप दूसरों की खबर तो रोज लेते हैं, लेकिन आज आपकी खबर किसने ली?

admin1

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