वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्षों और सप्लाई चेन में हो रही बाधाओं के बीच वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भारत की आयात पर निर्भरता को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अपनी विशाल भू-वैज्ञानिक संपदा का उपयोग कर ऊर्जा और खनिजों के क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर’ बनने की तत्काल आवश्यकता है।
अग्रवाल ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारत को उन युद्धों की आर्थिक कीमत (जैसे कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि) चुकानी पड़ रही है, जिनसे उसका सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने आंकड़े साझा करते हुए बताया कि भारत वर्तमान में अपने तेल का 90%, तांबे का 95% और सोने का 99.5% आयात करता है, जबकि देश के पास इन संसाधनों का प्रचुर भंडार मौजूद है।
प्रमुख उपलब्धियां और भविष्य के लक्ष्य
अनिल अग्रवाल ने वेदांता की सफलता को निजी उद्यमों की क्षमता के उदाहरण के रूप में पेश किया:
- उत्पादन में वृद्धि: वेदांता ने अधिग्रहण के बाद जिंक का उत्पादन 10 गुना और एल्युमिनियम का 20 गुना बढ़ाया है।
- राजकोष में योगदान: पिछले 10 वर्षों में कंपनी ने राष्ट्रीय खजाने में ₹4.5 लाख करोड़ का योगदान दिया है।
- महत्वाकांक्षी लक्ष्य: भविष्य में कंपनी का लक्ष्य प्रतिदिन 10 लाख बैरल तेल और 10 करोड़ टन लौह अयस्क (Iron Ore) का उत्पादन करना है।
नीतिगत सुधार और ‘सेल्फ-सर्टिफिकेशन’ की मांग
अग्रवाल ने सरकार से उद्यमियों को बड़े स्तर पर काम करने की स्वतंत्रता देने और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की अपील की। उनके मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं:
- सरल नियम: लंबी अनुमोदन प्रक्रियाओं और मुकदमेबाजी के बजाय सेल्फ-सर्टिफिकेशन और ऑडिट आधारित व्यवस्था अपनाई जाए।
- भरोसे की संस्कृति: व्यवसायों पर संदेह करने के बजाय उन्हें सम्मान और ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) मिलना चाहिए।
- ग्लोबल चैंपियंस: भारत को रियो टिंटो या बीएचपी की तर्ज पर वैश्विक स्तर के माइनिंग चैंपियंस की जरूरत है। उन्होंने मध्य प्रदेश की हीरा खदान परियोजना का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे जटिल नियमों के कारण देश ने एक बड़ा अवसर खो दिया।
“संपत्ति का उपयोग अंततः समाज के लिए होना चाहिए। यदि हम भारत के प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र की पूरी क्षमता को खोल दें, तो यह देश को विकसित राष्ट्र बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।” — अनिल अग्रवाल, चेयरमैन, वेदांता
