वेदांता चेयरमैन अनिल अग्रवाल का ‘आत्मनिर्भर भारत’ विज़न: प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र में उद्यमी-नेतृत्व और PSU सुधार का आह्वान

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वेदांता लिमिटेड के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भारत के आयात बिल को कम करने और देश को संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक साहसिक रोडमैप पेश किया है। उन्होंने सोशल मीडिया (X) के माध्यम से सरकार से आग्रह किया है कि प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र में भारतीय उद्यमियों को अधिक जिम्मेदारी और अवसर दिए जाएं।

अग्रवाल का मानना है कि जिस तरह भारतीय उद्यमियों ने दूरसंचार, विमानन, बंदरगाह और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में विश्वस्तरीय उद्योग खड़े किए हैं, वही सफलता खनन और हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में भी दोहराई जा सकती है।


PSU परिवर्तन: 24 सार्वजनिक उपक्रमों का आकलन

अनिल अग्रवाल ने हाइड्रोकार्बन, खनिज, धातु और उर्वरक क्षेत्रों के 24 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का विश्लेषण साझा किया:

  • अपार क्षमता: उन्होंने इन कंपनियों के पास मौजूद मजबूत मानव संसाधन और तकनीकी बुनियादी ढांचे की सराहना की।
  • रणनीति: उनका सुझाव है कि यदि इन PSUs को उद्यमी नेतृत्व और रणनीतिक निवेश मिले, तो ये घरेलू उत्पादन में क्रांतिकारी वृद्धि कर सकते हैं।
  • रोजगार सुरक्षा: अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि इस मॉडल को बिना किसी की नौकरी के नुकसान के लागू किया जा सकता है।

“जमीन के नीचे” की क्रांति: कृषि जैसी सफलता की दरकार

अग्रवाल ने एक दिलचस्प तुलना करते हुए कहा:

“भारत ने ‘जमीन के ऊपर’ यानी कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता और आत्मनिर्भरता हासिल की है। अब समय आ गया है कि हम ‘जमीन के नीचे’ के क्षेत्रों—जैसे खनन और हाइड्रोकार्बन—में भी वही गति और विशेषज्ञता दिखाएं, क्योंकि हमारे पास प्रचुर मात्रा में भूवैज्ञानिक संसाधन मौजूद हैं।”


सफलता के प्रमाण: हिंदुस्तान जिंक और बाल्को (BALCO)

अपने विज़न को पुख्ता करने के लिए उन्होंने वेदांता द्वारा संचालित Hindustan Zinc और BALCO के परिवर्तन का उदाहरण दिया:

  • उत्पादन: रणनीतिक निवेश और उन्नत तकनीक के बाद उत्पादन में 10 से 15 गुना की वृद्धि हुई।
  • रोजगार: इन इकाइयों में रोजगार के अवसरों में 5 गुना की बढ़ोतरी देखी गई।
  • इकोसिस्टम: इन बड़े उद्योगों के विस्तार से ‘डाउनस्ट्रीम’ (अनुषंगी) उद्योगों को भी भारी बढ़ावा मिला।

आयात निर्भरता पर प्रहार

वर्तमान में भारत अपनी जरूरतों के लिए प्राकृतिक संसाधनों के भारी आयात पर निर्भर है। अनिल अग्रवाल का तर्क है कि यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि भारत वैश्विक स्तर पर एक ‘रिसोर्स हब’ बनकर उभरेगा।

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