शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट के वीडियो सामने आने के बाद पुलिस की भूमिका, कानून की निष्पक्षता और सत्ता की जवाबदेही पर गंभीर सवाल
लेखक: ज़फ़र आलम ख़ान
लोकतंत्र की असली पहचान सिर्फ़ चुनाव, सरकार और संसद से नहीं होती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने विरोधियों, असहमत लोगों और सत्ता से सवाल पूछने वालों के साथ कैसा व्यवहार करता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का पैमाना यह नहीं कि उसके समर्थन में कितने लोग नारे लगा रहे हैं, बल्कि यह है कि उसके विरोध में आवाज़ उठाने वालों को कितनी सुरक्षा और कितनी आज़ादी हासिल है।
दिल्ली के जन्तर-मन्तर से सामने आईं कुछ तस्वीरें और वीडियो इसी बुनियादी सवाल को फिर हमारे सामने खड़ा करते हैं। इन दृश्यों में एक व्यक्ति को सड़क पर गिरे हुए दूसरे व्यक्ति के कपड़े पकड़कर खींचते और उसके साथ मारपीट करते हुए देखा जा सकता है। अन्य तस्वीरों में कुछ लोग भगवा गमछे पहने दिखाई देते हैं। एक तस्वीर में एक व्यक्ति हाथ में तख्ती लिए हुए है, जिस पर लिखा है— “भू-माफिया चबूतरा बोर्ड रद्द करो।” दूसरी तस्वीर में कुछ लोगों के हाथों में डंडे भी दिखाई देते हैं।
इन तस्वीरों और वीडियो की पूरी पृष्ठभूमि, घटनाक्रम और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ मारपीट हुई है और ऐसा करने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि कानून के समान अनुपालन और नागरिकों की सुरक्षा का सवाल भी है।
सवाल प्रदर्शनकारियों से नहीं, कानून लागू करने वालों से भी है
किसी प्रदर्शन से असहमति हो सकती है। किसी संगठन की माँग अनुचित लग सकती है। किसी आंदोलन का तरीका भी किसी को पसंद नहीं आ सकता। लेकिन क्या किसी की असहमति उसे दूसरे व्यक्ति पर हाथ उठाने का अधिकार दे देती है?
बिल्कुल नहीं!
देश का कानून किसी व्यक्ति को इसलिए हिंसा करने की छूट नहीं देता कि वह किसी विशेष विचारधारा, संगठन या राजनीतिक दल के साथ खड़ा है। सड़क पर किसी को पीटना, धमकाना या कानून अपने हाथ में लेना किसी भी परिस्थिति में जाँच और कानूनी कार्रवाई के दायरे से बाहर नहीं होना चाहिए।
ऐसे में सबसे अहम सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर उठता है। यदि घटनास्थल पर पुलिस मौजूद थी, तो क्या उसने हिंसा रोकने की कोशिश की? क्या पीड़ितों की शिकायत दर्ज की गई? क्या वीडियो के आधार पर आरोपित व्यक्तियों की पहचान की गई? क्या किसी को हिरासत में लिया गया या कोई अन्य वैधानिक कार्रवाई हुई?
इन सवालों का जवाब तस्वीरों के आधार पर अकेले नहीं दिया जा सकता। लेकिन प्रशासन की ज़िम्मेदारी है कि वह इनका स्पष्ट और तथ्यपूर्ण उत्तर दे।
कानून की निष्पक्षता केवल इस बात से साबित नहीं होती कि पुलिस ने किसी कमजोर या निहत्थे प्रदर्शनकारी को कितनी जल्दी रोक लिया। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब कानून हाथ में लेने वाला व्यक्ति राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक ताकत या सामाजिक दबदबे का सहारा लेता दिखाई दे।
क्या विरोध का अधिकार सत्ता की अनुमति पर निर्भर है?
भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध भी लागू होते हैं, लेकिन इन प्रतिबंधों का अर्थ यह नहीं कि किसी नागरिक को अपनी बात रखने के लिए हिंसा का सामना करना पड़े।
पिछले वर्षों में देश ने किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जुड़े विरोध-प्रदर्शन तथा अनेक दूसरे जनआंदोलन देखे हैं। इन आंदोलनों के उद्देश्य, स्वरूप और राजनीतिक समर्थन अलग-अलग रहे हैं। इन पर बहस भी हुई और कई मामलों में प्रशासन तथा आंदोलनकारियों के बीच गंभीर टकराव भी देखने को मिले।
लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में इन सभी घटनाओं से एक ही बुनियादी सिद्धांत निकलता है—सरकार की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है और विरोध करने वाले की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
यदि किसी आंदोलन में कानून का उल्लंघन होता है, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि प्रदर्शनकारी हिंसा करते हैं, तो उन पर भी कानून लागू होना चाहिए। और यदि प्रदर्शन का विरोध करने वाले लोग हिंसा करते हैं, तो उनके विरुद्ध भी वैसी ही निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।
कानून का चरित्र व्यक्ति की पहचान देखकर नहीं, उसके आचरण और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर तय होना चाहिए।
क्या राजनीतिक संरक्षण की आशंका की जाँच होगी?
इन तस्वीरों में भगवा गमछे पहने लोगों की मौजूदगी अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। किसी का पहनावा, धार्मिक पहचान या राजनीतिक विचारधारा उसे अपराधी नहीं बनाते। उसी तरह, किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ाव किसी को कानून से ऊपर भी नहीं कर सकता।
लेकिन जब किसी घटना में मारपीट के आरोप सामने आते हैं और लोगों को यह आशंका होती है कि आरोपितों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, तो प्रशासन को इस आशंका का जवाब तथ्यों और कार्रवाई से देना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति को केवल उसके राजनीतिक संबंधों के कारण बचाया जाता है, तो यह कानून के समान अनुपालन की भावना के विरुद्ध होगा। और यदि संरक्षण का आरोप निराधार है, तो निष्पक्ष जाँच उसे भी स्पष्ट कर सकती है।
इसलिए सरकार और पुलिस के सामने चुनौती केवल शांति बनाए रखने की नहीं, बल्कि अपनी निष्पक्षता को प्रमाणित करने की भी है।
सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं, लेकिन पुलिस और प्रशासन किसी एक दल के नहीं, संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह होते हैं।
पुलिस की वर्दी का सम्मान तभी, जब कानून सबके लिए एक हो
पुलिस की मौजूदगी नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा देने के लिए होती है। कोई व्यक्ति सड़क पर पिट रहा हो, किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार हो रहा हो या किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसक बनाने की कोशिश की जा रही हो—ऐसी परिस्थितियों में पुलिस की पहली प्राथमिकता हिंसा रोकना और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होनी चाहिए।
यदि पुलिस किसी घटना को रोकने में विफल रहती है, तो परिस्थितियों की जाँच होनी चाहिए। यदि किसी पुलिसकर्मी ने जानबूझकर हिंसा की अनदेखी की, शिकायत दर्ज करने से इनकार किया या किसी आरोपित को अनुचित संरक्षण दिया, तो उस भूमिका की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
हालाँकि, केवल किसी तस्वीर में पुलिस की अनुपस्थिति या निष्क्रियता दिखाई देने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा प्रशासन किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर काम कर रहा है। इसके लिए घटनाक्रम, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, वीडियो और पुलिस रिकॉर्ड की जाँच जरूरी है।
लोकतंत्र में आरोप लगाने का अधिकार है, लेकिन आरोपों की जाँच और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
सरकार को आखिर क्या संदेश देना चाहिए?
किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिकों के बीच यह विश्वास कायम रखना है कि न्याय पाने के लिए किसी राजनीतिक दल का समर्थक होना जरूरी नहीं और न्याय से बचने के लिए किसी राजनीतिक दल का समर्थक होना पर्याप्त नहीं।
यदि जन्तर-मन्तर पर हुई घटना में मारपीट की पुष्टि होती है, तो आरोपितों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने, चिकित्सा सहायता प्राप्त करने और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुँचने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। पुलिस की भूमिका पर सवाल हैं, तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वह शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए क्या कदम उठा रही है और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा कानून हाथ में लेने की स्थिति में प्रशासन का क्या रवैया होगा।
क्योंकि अगर आम नागरिक के मन में यह धारणा मजबूत होने लगे कि न्याय उसकी नागरिकता, विचारधारा या राजनीतिक पहुँच के आधार पर मिलता है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उसका भरोसा कमजोर होगा।
देश को संवाद चाहिए, टकराव नहीं
भारत विविधताओं का देश है। यहाँ धर्म, जाति, भाषा, विचारधारा और राजनीतिक पसंद में अंतर होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र का उद्देश्य इन अंतरों को मिटाना नहीं, बल्कि इनके बावजूद शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का रास्ता बनाए रखना है।
जब विरोध का जवाब तर्क के बजाय हिंसा से दिया जाता है, तो समाज में अविश्वास बढ़ने का खतरा पैदा होता है। जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं और कानून उनकी रक्षा नहीं करेगा, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी होती है।
क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहाँ हर असहमति को दुश्मनी समझा जाए? जहाँ राजनीतिक पहचान के आधार पर लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार होने की आशंका बनी रहे? या ऐसा भारत, जहाँ हर नागरिक अपनी बात कह सके, हर आरोप की निष्पक्ष जाँच हो और हर अपराध पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो?
यह किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न नहीं है। यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य का प्रश्न है।
निष्कर्ष: कानून का राज या ताकतवर की मर्जी?
जन्तर-मन्तर से सामने आई तस्वीरों और वीडियो की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। यदि मारपीट हुई है, तो दोषियों की पहचान करके उनके विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही की है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। और यदि राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो सरकार को पारदर्शी कार्रवाई के माध्यम से उनका जवाब देना चाहिए।
किसी भी लोकतंत्र को कमजोर करने वाली सबसे खतरनाक स्थिति केवल सड़कों पर होने वाली हिंसा नहीं, बल्कि वह धारणा है कि कुछ लोग कानून से ऊपर हैं और कुछ लोगों के लिए कानून का डंडा हमेशा तैयार रहता है।
ऐसी धारणा को दूर करना सरकार, पुलिस, न्यायिक संस्थाओं और नागरिक समाज—सभी की जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र में सत्ता को सवालों से डरना नहीं चाहिए और नागरिकों को सवाल पूछने के कारण हिंसा से डरना नहीं चाहिए।
देश को गृहयुद्ध की आशंकाओं और आपसी नफरत की ओर धकेलने के बजाय हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहाँ विरोध हो तो उसका जवाब संवाद से दिया जाए, विवाद हो तो उसका समाधान कानून से निकले और अपराध हो तो कार्रवाई राजनीतिक पहचान देखकर नहीं, प्रमाण देखकर हो।
क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति किसी भीड़, किसी संगठन या किसी राजनीतिक दल की नहीं—संविधान और कानून की होनी चाहिए।
