अहंकार नहीं,विनम्रता ही मनुष्य के व्यक्तित्व का सच्चा आभूषण है – प्रिंस देवांश

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महाराजपुर में द्वितीय दिवस मनाया गया उत्तम मार्दव धर्म

महाराजपुर-:सागर जिले में देवरी के ग्राम महाराजपुर में दशलक्षण महापर्व बड़े उत्साह से साथ मनाया जा रहा है। जिसमें श्री 1008 नेमिनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर एवं श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर (सोधिया मोहल्ला) में दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म मनाया गया। प्रातः काल में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन हुई।दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए 1008 नेमिनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में रेनी दीदी,अनु दीदी ने एवं 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर (सोधिया मोहल्ला) में प्रिंस शास्त्री देवांश (फिरोजाबाद) ने उत्तम मार्दव धर्म का संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक अहंकार है। धन, पद, प्रतिष्ठा, रूप, ज्ञान, जाति अथवा सामर्थ्य का अभिमान व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप से दूर कर देता है। इसके विपरीत विनम्रता मनुष्य को आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की दिशा में ले जाती है।जैन दर्शन में ‘मार्दव’ का अर्थ कोमलता और विनम्रता से है। मान-कषाय का क्षय और अहंकार का त्याग ही उत्तम मार्दव धर्म की साधना है। जब मनुष्य यह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ भी मिला है, वह स्थायी नहीं है, तब उसके भीतर स्वयं को श्रेष्ठ मानने का भाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।वास्तव में मनुष्य की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके पास कितना धन है, उसका पद कितना ऊंचा है या समाज में उसकी कितनी प्रतिष्ठा है। उसकी महानता इस बात में है कि सामर्थ्य होने के बाद भी उसके व्यवहार में कितनी विनम्रता है। जो व्यक्ति अपने से छोटे को सम्मान दे, अपनी भूल स्वीकार करे और दूसरों के गुणों को देखकर प्रसन्न हो—वही मार्दव धर्म को अपने जीवन में उतार रहा है।
आज के समय में अहंकार केवल बड़े-बड़े पदों और संपत्ति तक सीमित नहीं है। कभी ज्ञान का अहंकार, कभी धार्मिकता का अहंकार, कभी रिश्तों में अपने अधिकार का अहंकार तो कभी अपनी बात को ही सही मानने का अहंकार हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। इसलिए उत्तम मार्दव धर्म हमें भीतर झांकने और स्वयं से प्रश्न करने की प्रेरणा देता है कि क्या हमारी विनम्रता केवल शब्दों में है या हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है?
यदि परिवार में विनम्रता आ जाए तो विवाद कम हो सकते हैं, समाज में विनम्रता आ जाए तो आपसी सम्मान बढ़ सकता है और धर्म के क्षेत्र में विनम्रता आ जाए तो साधना में दिखावा समाप्त होकर आत्मचिंतन प्रारंभ हो सकता है।दोपहर में भैया जी द्वारा तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय किया गया।
सायंकाल में संगीतकारों द्वारा श्रीजी की भव्य आरती, भक्तामर स्तोत्र पाठ एवं आलोचना पाठ के पश्चात सामूहिक प्रतिक्रमण कराया गया। इसके उपरांत उत्तम मार्दव पर विशेष प्रवचन हुए, उत्तम मार्दव धर्म का संदेश स्पष्ट है—‘मैं’ को छोटा किए बिना आत्मा की महानता प्रकट नहीं हो सकती। इसलिए दशलक्षण पर्व पर केवल उत्तम मार्दव धर्म का श्रवण ही न करें, बल्कि अपने व्यवहार से उसे सार्थक करें। किसी को छोटा न समझें, अपनी उपलब्धियों का अभिमान न करें और प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान एवं विनम्रता का भाव रखें।
यही उत्तम मार्दव धर्म को मंदिर से घर तक, प्रवचन से व्यवहार तक और पर्व से जीवन तक पहुंचाने की सार्थक साधना होगी।
रात्रि 9 से 10 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम में तंबोला का आयोजन हुआ एवं सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा उत्साह पूर्वक पुण्य लाभ अर्जित किया।

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