मुख्यमंत्री के सामने कैलाश विजयवर्गीय का ACS संजय दुबे को ‘रिटायरमेंट ज्ञान’
मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक दीर्घाओं में इन दिनों एक वीडियो और एक बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में सूबे के कद्दावर नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ही विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे की मंच से जो “तारीफ” की है, उसने सियासी हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
पहली नजर में जो बात एक अफसर की पीठ थपथपाना लगती है, राजनीतिक चश्मे से देखने वाले उसे एक बेहद धारदार और सोची-समझी ‘प्रशासनिक सर्जिकल स्ट्राइक’ मान रहे हैं।
सवाल उठ रहा है कि क्या कैलाश विजयवर्गीय ने वाकई संजय दुबे के काम की सराहना की या फिर तारीफ के इस मखमली लिफाफे में एक बेहद कड़वा और तीखा कटाक्ष छिपा था?
क्या कहा विजयवर्गीय ने? जिसने बढ़ाई हलचल…
एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के सामने माइक संभालते ही कैलाश विजयवर्गीय ने ACS संजय दुबे की तरफ मुखातिब होते हुए कहा कि “संजय दुबे जी बहुत ही योग्य अधिकारी हैं… लेकिन अब इनका रिटायरमेंट नजदीक आ रहा है, इसलिए शायद ये…”। इसके बाद उन्होंने दुबे को रिटायरमेंट के बाद किसी ‘आश्रम’ जाने या आध्यात्मिक राह पकड़ने की जो सलाह दे डाली, उसने मंच पर बैठे दिग्गजों और सामने बैठी नौकरशाही को मुस्कुराने पर तो मजबूर किया, लेकिन इसके पीछे के सियासी तनाव को छुपा नहीं सकी।
क्रोनोलॉजी समझिए : क्यों आया यह ‘तारीफ’ वाला मोड़?
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे हाल ही में हुआ वह ‘खुलासा’ है जिसने सीधे नगरीय प्रशासन विभाग की साख पर सवाल खड़े किए थे :
AI तकनीक और 1100 करोड़ का महा-घोटाला : ACS संजय दुबे ने पिछले दिनों एक बड़ा खुलासा किया था कि नगरीय निकायों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक के जरिए करीब 1100 करोड़ रुपये की सरकारी खरीदी में भारी धांधली और भ्रष्टाचार को पकड़ा गया है। इसका वीडियो और खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गईं।
विभाग की किरकिरी और मंत्री की घेराबंदी : चूंकि यह पूरा महकमा कैलाश विजयवर्गीय के अधीन आता है, इसलिए इस खुलासे ने सीधेतौर पर मंत्री की कार्यप्रणाली या उनके नाक के नीचे चल रहे खेल को जनता के सामने ला खड़ा किया। हालांकि, विजयवर्गीय ने डैमेज कंट्रोल करते हुए तुरंत कहा कि दोषियों को सस्पेंड और ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जा रहा है, लेकिन विभाग की बदनामी तो हो चुकी थी।
‘भागीरथपुरा कांड’ का पुराना साया : इंदौर के चर्चित भागीरथपुरा कांड को सत्ता और प्रशासन के गलियारों में बैठे लोग भूले नहीं हैं। तब भी पर्दे के पीछे से गहरी साजिश रचने और तत्कालीन कद्दावर नेताओं व अफसरों के बीच शह-मात के खेल के आरोप लगे थे। संजय दुबे और कैलाश विजयवर्गीय के बीच की यह ‘केमिस्ट्री’ कोई नई नहीं है; इसके तार पुराने प्रशासनिक टकरावों से भी जुड़ते रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजयवर्गीय का यह बयान शुद्ध रूप से “तारीफ के बहाने कड़ा संदेश” था। इसके तीन बड़े सियासी मायने निकलते हैं:
रिटायरमेंट की याद दिलाकर ‘कद’ बताना : नौकरशाही में जब किसी बेहद सक्रिय अधिकारी को सार्वजनिक मंच से उसके ‘रिटायरमेंट’ की याद दिलाई जाती है, तो उसका सीधा अर्थ होता है—”अब आपकी पारी खत्म होने वाली है, इसलिए अपनी सीमाएं न लांघें।”
सुपर-एक्टिव मोड पर ब्रेक लगाने की कोशिश : तकनीक और AI के नाम पर जिस तरह नगरीय निकायों के भ्रष्टाचार को उजागर कर वाहवाही बटोरी जा रही थी, उसने विभाग के मुखिया (मंत्री) की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुँचाया। विजयवर्गीय ने मंच से यह जता दिया कि अफसर चाहे कितना भी बड़ा खुलासा कर ले, नियंत्रण अंततः राजनीतिक नेतृत्व के हाथ में ही रहेगा।
मुख्यमंत्री के सामने शक्ति प्रदर्शन : सीएम मोहन यादव की मौजूदगी में ऐसा बयान देकर विजयवर्गीय ने यह साफ संदेश दिया कि वे अपने विभाग के भीतर किसी भी अफसर की ‘वन-मैन आर्मी’ वाली छवि को बर्दाश्त नहीं करेंगे, भले ही वह कितना ही रसूखदार क्यों न हो।
दरअसल, सियासत में ‘तारीफ’ कब ‘कटाक्ष’ बन जाए और ‘आशीर्वाद’ कब ‘चेतावनी’ में बदल जाए, यह कहना मुश्किल होता है। कैलाश विजयवर्गीय राजनीति के मँझे हुए खिलाड़ी हैं; उन्होंने संजय दुबे को ‘योग्य’ भी बता दिया ताकि कोई नाराजगी न दिखे और लगे हाथ उनकी प्रशासनिक सक्रियता की मियाद (रिटायरमेंट) तय कर उन्हें अध्यात्म का रास्ता भी दिखा दिया। अब देखना यह है कि 1100 करोड़ के इस भ्रष्टाचार की फाइलें आगे क्या मोड़ लेती हैं, और क्या नौकरशाही इस ‘राजनीतिक चुटकी’ के बाद बैकफुट पर आती है या फिर अंदरूनी जंग और तेज होती है
