किसी चौराहे की लस्सी पर उमड़ती भीड़,छोले-भटूरे की लंबी कतारें…
कहीं समोसे-कचौरी-चाट के ठेलों पर रौनक,तो कहीं रोज़ खुलते चिकन-मटन के नए रेस्टोरेंट।
यहाँ तक कि रोटियां सेंकने वाली छोटी दुकाने भी
अब बिरयानी वालों से होड़ ले रही हैं…
सुबह हर नुक्कड़ पर पोहा-जलेबी की खुशबू,
और रात तक हर निवाला बाज़ार के हवाले—घर का चूल्हा ठंडा… और शहर का ज़ायका गर्म।
एक खामोश खतरा भी —
जितनी तेज़ी से खाने के ठिकाने बढ़ रहे हैं,
उतनी ही रफ्तार से अस्पताल भी आबाद हो रहे हैं।
अब ज़रा ठहर कर सोचिए…
ये ज़ायका है, वक़्त की मजबूरी,
या जिम्मेदारियों से दूर भागने का नया अंदाज़?
बाहर का खाना सिर्फ स्वाद देता है,
मगर बदले में ले जाता है—
सेहत, सुकून और सादगी।
जिस्म को बीमार और ज़ेहन को आदतों का कैदी बना देता है।
हर तरफ़ दिखावा, हर तरफ़ खर्च…
मगर दिलों का सुकून कहीं गुम सा हो गया है।
सोचिये आज महमान की दावत फार्महाउस पर हो रही है
क्या हमारे बुज़ुर्ग भी यूँ ही खर्च करते थे?
या कम में भी खुश, सादगी में भी अमीर थे?
सबसे बड़ा नुकसान ये नहीं कि हम बाहर खा रहे हैं,
बल्कि ये है कि हम घर की तहज़ीब भूल जा रहे हैं वो साथ बैठना, वो मोहब्बत से परोसा गया निवाला…
जो सिर्फ पेट नहीं, रिश्तों को भी भरता था।
अगर यही तरक्की है,
तो घर क्यों वीरान और अस्पताल क्यों भरे हैं?
भोपालियत सिर्फ स्वाद नहीं,
बल्कि सादगी, अपनापन और एहसास का नाम है—उसे बचाना ही असली समझदारी है।
