धर्मशाला के लेह सिम्पोजियम में एम्स के डॉ. वरुण मल्होत्रा ने सिखाया सांसों से शांति का विज्ञान

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एम्स भोपाल के शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. वरुण मल्होत्रा ने धर्मशाला में हुए 8वें अंतर्राष्ट्रीय लेह सिम्पोजियम में वक्ता के रूप में भाग लिया। उन्होंने ध्यान और श्वास के वैज्ञानिक पक्ष को समझाया। साथ ही वीडियो के जरिए दिखाया कि धीमी गहरी श्वास से कुछ ही मिनटों में शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 77 से बढ़कर 83 प्रतिशत हो गया। यह निष्कर्ष ऊंचाई वाली जगहों पर जाने वाले लोगों के लिए अहम माना जा रहा है। यह सिम्पोजियम हाइपोबैरिक हाइपोक्सिक सोसाइटी, दिल्ली की ओर से आयोजित हुआ। इसका
विषय “हाइपोक्सिया में फुफ्फुसीय रोगों के लिए चिकित्सीय लक्ष्य और आणविक पहलू” था। हाइपोक्सिया यानी शरीर में ऑक्सीजन की कमी।

डॉ. मल्होत्रा ने प्रतिनिधियों के लिए 90 मिनट का एक अनुभवात्मक सत्र लिया। “ब्रीद, ब्रेन, एंड काम: साइंटिफिक इनसाइट्स इनटू गाइडेड योगिक मेडिटेशन” शीर्षक वाले इस सत्र में उन्होंने योगदा सत्संग परंपरा से प्रतिभागियों का परिचय कराया। सत्र में प्रार्थना, मंत्रोच्चार, श्वास जागरूकता, प्रगतिशील विश्राम और विज़ुअलाइज़ेशन के साथ 20:20:20 श्वास तकनीक भी शामिल थी। इसमें 10 की गिनती में श्वास लेना, रोकना और छोड़ना होता है। डॉ. मल्होत्रा ने इन अभ्यासों का वैज्ञानिक आधार भी बताया। उन्होंने कहा कि धीमी गहरी श्वास से शरीर को शांत करने वाला तंत्रिका तंत्र सक्रिय होता है और हृदय गति परिवर्तनशीलता, यानी दिल की धड़कनों के बीच के समय का बदलाव, बेहतर होती है। ध्यान का संबंध मस्तिष्क के डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की गतिविधि में बदलाव और ध्यान लगाने की बेहतर क्षमता से भी है। इसके अलावा ध्यान मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स और एमिग्डाला हिस्सों पर असर डालता है, जिससे भावनाओं पर नियंत्रण बेहतर होता है और तनाव घटता है। इसके बाद हुई पैनल चर्चा में डॉ. मल्होत्रा ने वीडियो प्रस्तुत किया। इसमें पल्स ऑक्सीमीटर से मापी गई ऑक्सीजन संतृप्ति कुछ ही मिनटों में 77 से 83 प्रतिशत तक पहुंचती दिखी। उन्होंने बताया कि यह निष्कर्ष अमरनाथ और माउंट कैलाश जैसे ऊंचे स्थानों पर जाने वाले सैनिकों, ट्रेकरों और तीर्थयात्रियों के लिए अनुकूलन में महत्वपूर्ण है।

डॉ. मल्होत्रा की भागीदारी ने प्राचीन योगिक प्रथाओं और आधुनिक शारीरिक विज्ञान को करीब लाने का काम किया। प्रतिनिधियों को श्वास, मस्तिष्क और मन के संबंध की अनुभवात्मक समझ के साथ ठोस वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी मिला। इससे ऊंचाई वाले इलाकों में हाइपोक्सिया और तनाव के प्रबंधन के लिए एक संभावित गैर-औषधीय उपाय सामने आया।

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