एम्स भोपाल के जैवरसायन (बायोकेमिस्ट्री) विभाग ने 21 सितंबर 2026 को विश्व अल्जाइमर दिवस के अवसर पर एक सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम का सफल आयोजन किया। कार्यक्रम का विषय था “न्यूरोडीजेनरेटिव (तंत्रिका क्षरण संबंधी) रोगों की पहचान और प्रबंधन में नई दिशाएं”। इस कार्यक्रम में जैवरसायन, न्यूरोलॉजी और फिजियोलॉजी (शरीर क्रिया विज्ञान) विभागों के 150 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। इनमें संकाय सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और पीएचडी शोधार्थी शामिल थे।
कार्यक्रम की शुरुआत में जैवरसायन विभाग के प्रभारी विभागाध्यक्ष प्रो अश्विन कोटनिस ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने विभाग की प्रगति की जानकारी दी और बताया कि न्यूरोडीजेनरेटिव रोगों की पहचान में क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्री के जैव-चिह्नकों (बायोमार्कर, यानी रोग की पुष्टि करने वाले जैविक संकेत) की भूमिका किस तरह बढ़ती जा रही है। कार्यक्रम का उद्घाटन एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ) नरेन्द्र कोतवाल (रि) ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि रक्त में अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनरेटिव रोगों के शुरुआती जैव-चिह्नकों की पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे समय रहते निदान और उपचार संभव हो सकेगा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आक्रामक (इनवेसिव) जांच पद्धतियों से हटकर ऐसी जांच सुविधाओं की ओर बढ़ना जरूरी है, जो बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराई जा सकें और भारतीय आबादी के लिए आसानी से सुलभ हों।
इस कार्यक्रम का संचालन जैवरसायन विभाग के प्रोफेसर एवं आयोजन सचिव प्रो (डॉ) सुखेस मुखर्जी ने बखूबी किया। वैज्ञानिक सत्रों के दौरान जैव-चिह्नक संबंधी नवाचारों पर विशेषज्ञों के व्याख्यान हुए। इसके साथ ही भारत में अल्जाइमर की जांच सुविधा को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के विषय पर एक पैनल चर्चा भी आयोजित की गई।
