मुंबई — स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) रिसर्च ने 15 सितंबर 2026 को जारी अपनी नवीनतम इकोवेरैप रिपोर्ट (इश्यू नंबर 26, वित्तीय वर्ष 27) में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) को आगामी अक्टूबर और दिसंबर की बैठकों में रेपो दर में 25-25 बेसिस पॉइंट्स (0.25%) की दो किश्तों में बढ़ोतरी करने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति (सीपीआई) बढ़कर 4.82% हो गई है, जिसे नियंत्रित करने और भविष्य के आर्थिक आंकड़ों का सही आकलन करने के लिए समय रहते नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि करना आवश्यक है।
एसबीआई रिसर्च के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि देश में मुद्रास्फीति का प्रभाव अब केवल कुछ वस्तुओं तक सीमित न रहकर व्यापक (जनरलाइज्ड) होने लगा है। जनवरी 2026 में जहां 22 वस्तुएं सीपीआई के 90% योगदान के लिए जिम्मेदार थीं, वहीं अगस्त तक ऐसी वस्तुओं की संख्या बढ़कर 51 हो गई है और कोर इन्फ्लेशन भी बढ़कर 4.16% तक पहुंच गया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2027 की शुरुआत में 6% से नीचे आने से पहले खुदरा महंगाई दर 6.5% के स्तर को पार कर सकती है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे अगस्त में भारत की आयातित मुद्रास्फीति (इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन) बढ़कर 7.75% हो गई है।
बॉन्ड मार्केट का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक दबावों के कारण भारतीय 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.10% हो गई है, जिसके आगे 7.25% और फिर 7.50% तक जाने का जोखिम बना हुआ है। बढ़ते कर्ज की लागत के कारण अगस्त में कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी करने की दर में 45% की गिरावट आई है। एसबीआई के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. सौम्य कांति घोष के अनुसार, हालांकि एफसीएनआर (बी) के जरिए आए भारी विदेशी मुद्रा प्रवाह ने बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी को कुछ हद तक सहारा दिया है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए आरबीआई द्वारा सख्त और स्पष्ट नीतिगत कदम उठाए जाना बेहद जरूरी है।
