98% गोदी चैनल घाटे में, कर्मचारियों और रिपोर्टरों को समय पर वेतन देना भी मुश्किल

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मोहन गुरुस्वामी-

भारत में टेलीविजन कारोबार पर संकट गहराता जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में 50 से अधिक टीवी चैनल अपने लाइसेंस सरेंडर कर चुके हैं। इसकी वजह पे-टीवी के दर्शकों की घटती संख्या, संचालन की बढ़ती लागत और विज्ञापन का डिजिटल माध्यमों की ओर जाना बताया जा रहा है। इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि जो चैनल अब भी चल रहे हैं, उन्हें आर्थिक रूप से कौन संभाल रहा है? उन पर भारी विज्ञापन देने वालों की सूची देखिए। उत्तर प्रदेश सरकार अब टीवी चैनलों की सबसे बड़ी विज्ञापनदाताओं में शामिल नजर आती है।

मोहन गुरुस्वामी के मुताबिक, भारत में टीवी चैनलों के लिए कारोबार करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। पिछले तीन वर्षों के दौरान 50 से ज्यादा चैनलों ने अपने प्रसारण लाइसेंस वापस कर दिए हैं। पे-टीवी ग्राहकों की संख्या में गिरावट, परिचालन खर्च में बढ़ोतरी और ऑनलाइन मीडिया की तरफ विज्ञापन का रुख इस संकट की प्रमुख वजहें हैं। एचडी न्यूज फीड और छोटे क्षेत्रीय बाजारों में विस्तार जैसे महंगे प्रयोग भी अब बंद किए जा रहे हैं।
पे-टीवी घरों की संख्या में भी बड़ी गिरावट आई है। वर्ष 2018 में जहां देश में करीब 15.1 करोड़ घर पे-टीवी सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे थे, वहीं यह संख्या घटकर लगभग 11.1 करोड़ रह गई है। कुछ हालिया अनुमानों में यह आंकड़ा इससे भी कम बताया गया है। दूसरी ओर, डिजिटल माध्यमों और मुफ्त टीवी सेवाओं का दायरा बढ़ रहा है।

सरकारी मुफ्त सैटेलाइट सेवा डीडी फ्री डिश और कम कीमत वाली कनेक्टेड टीवी सेवाएं उन दर्शकों को अपनी ओर खींच रही हैं, जो हर महीने केबल या डीटीएच का शुल्क नहीं देना चाहते। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों के बाजारों में ऐसे दर्शकों की संख्या बढ़ रही है।

टीवी चैनलों की विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी दबाव है। पारंपरिक टीवी पर विज्ञापनों की संख्या और उनकी दरों में नरमी आई है। मोबाइल वीडियो, ओटीटी प्लेटफॉर्म और कनेक्टेड टीवी की ओर युवा और शहरी विज्ञापनदाताओं का रुझान बढ़ रहा है। इससे पारंपरिक टीवी का विज्ञापन बाजार प्रभावित हो रहा है।
हालांकि दक्षिण भारत में अभी भी पारंपरिक टेलीविजन की मजबूत पकड़ बनी हुई है। वहां स्थानीय भाषाओं के कार्यक्रमों, धारावाहिकों और नियमित समय पर टीवी देखने की आदत के चलते दर्शक बड़ी संख्या में टीवी से जुड़े हुए हैं। उत्तर भारत के मुकाबले वहां डिजिटल विकल्पों की ओर बदलाव की रफ्तार भी अपेक्षाकृत धीमी है।

इस पूरे परिदृश्य में एक अहम सवाल विज्ञापन के सहारे चल रहे टीवी कारोबार का भी है। जब दर्शक और विज्ञापन दोनों पारंपरिक टीवी से दूर जा रहे हैं, तो चैनलों की आर्थिक सेहत आखिर किन विज्ञापनदाताओं के भरोसे टिकी है? मोहन गुरुस्वामी का इशारा है कि चैनलों पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन देने वालों को देखना चाहिए। उनके मुताबिक, उत्तर प्रदेश अब टीवी चैनलों के लिए सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं में शामिल हो चुका है।

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