आम जनता ने बनाई दूरी
पार्टी स्तर पर होना चाहिए था आयोजन
सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल और जनहित की अनदेखी पर उठे सवाल
धार। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस और उनके 25 वर्षों के सार्वजनिक सेवाकाल की उपलब्धियों के उपलक्ष्य में मध्य प्रदेश में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन बड़े पैमाने पर किया गया। हालांकि, इन आयोजनों की भव्यता के पीछे प्रशासनिक तंत्र का जो व्यापक इस्तेमाल देखने को मिला, उसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। पूरे आयोजन के दौरान सरकारी अमला पूरी तरह सक्रिय रहा, लेकिन आम जनमानस की सहभागिता नाममात्र की भी नजर नहीं आई।
सरकारी अमले को झोंका, जनता ने दिखाई बेरुखी
कार्यक्रमों को सफल बनाने और भीड़ जुटाने के लिए संपूर्ण प्रशासनिक मशीनरी को झोंक दिया गया था। इसके बावजूद, आयोजनों में केवल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता, मंत्री, वरिष्ठ नेता, जनप्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी ही नजर आए। जिस आम जनता के नाम पर यह आयोजन खड़े किए गए थे, उसने इनसे पूरी तरह दूरी बनाए रखी।
जनहित की कमी और शून्य सहभागिता
स्थानीय आम लोगों का मानना है कि ऐसे आयोजनों में सीधे तौर पर जनहित से जुड़ा कोई पहलू नजर नहीं आया। यदि कार्यक्रमों से आम नागरिक को कोई वास्तविक फायदा या राहत मिलती, तो वे स्वतः ही इससे जुड़ते। सरकारी तंत्र के बल पर खड़े किए गए इस ढांचे में आम जनता की सहभागिता न के बराबर रहना यह दर्शाता है कि यह आयोजन आम लोगों की प्राथमिकताओं से दूर था।
राजनीतिक और प्रशासनिक मर्यादा पर उठे सवाल
राजनीतिक विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि प्रधानमंत्री के जन्मदिन और उनके 25 साल के कार्यकाल की उपलब्धियों का बखान करने जैसे कार्यक्रमों को शुद्ध रूप से पार्टी स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए था।
कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण
यदि यह आयोजन भाजपा के संगठन स्तर पर होता, तो पार्टी कार्यकर्ता अनुशासित और संगठित होकर सेवा एवं समर्पण की भावना को बेहतर ढंग से समझते।
राजनीतिक परिपक्वता
सेवा संकल्प के माध्यम से कार्यकर्ताओं को राजनीतिक और सामाजिक सेवा में भागीदारी का वास्तविक प्रशिक्षण मिलता।
प्रशासनिक तटस्थता
ऐसे आयोजनों से सरकारी तंत्र को पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए था ताकि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग न हो और प्रशासनिक तटस्थता बनी रहे।
सरकारी संसाधनों और अधिकारियों की ऊर्जा को जनसेवा के मूल कार्यों में लगाने के बजाय राजनीतिक ब्रांडिंग में झोंकने की इस नीति पर अब सवाल उठने लगे हैं। आम जनता का इस तरह आयोजनों से विमुख रहना यह साफ संदेश देता है कि सरकारी खर्च पर बनने वाले राजनीतिक माहौल से जनहित का कोई सरोकार नहीं है।
