मुंबई : भारतीय घरों में कपड़े धोना एक महत्वपूर्ण घरेलू कार्य है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सफाई की चाहत में जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट का उपयोग आपके कपड़ों और मशीन को बर्बाद कर रहा है? गोडरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड के आर एंड डी (पर्सनल केयर एवं होम केयर) के ग्लोबल हेड, संदीप नाइक के अनुसार, अत्यधिक डिटर्जेंट न केवल कपड़ों की उम्र कम करता है, बल्कि वॉशिंग मशीन में भी तकनीकी खराबी का कारण बनता है। भारत के कई प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु में ‘हार्ड वॉटर’ (कठोर पानी) की समस्या के कारण उपभोक्ता अक्सर दाग हटाने के लिए दोगुनी मात्रा में डिटर्जेंट डाल देते हैं, जो वास्तव में समस्या को और बढ़ा देता है।
संदीप नाइक बताते हैं कि जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट कपड़ों पर साबुन की एक परत छोड़ देता है, जिसमें धूल और दुर्गंध फंस जाती है। इससे कपड़े कड़े हो जाते हैं और वॉशिंग मशीन के ड्रेनेज पाइप में अवशेष जमा होने लगते हैं। इसके अलावा, भारत में इस्तेमाल होने वाले पाउडर डिटर्जेंट में खनिज आधारित फिलर्स होते हैं, जो पानी में पूरी तरह नहीं घुलते। ये अघुलनशील कण कपड़ों पर घर्षण बढ़ाते हैं, जिससे ‘लिंट’ (रोएँ) निकलने लगते हैं। इसके विपरीत, लिक्विड डिटर्जेंट पानी में जल्दी घुलते हैं और आधुनिक फ्रंट-लोड मशीनों के लिए अधिक सुरक्षित होते हैं, क्योंकि ये कम झाग बनाकर प्रभावी सफाई सुनिश्चित करते हैं।
विशेषज्ञ की सलाह है कि सफाई का समाधान डिटर्जेंट की मात्रा बढ़ाने में नहीं, बल्कि सही चुनाव और माप में है। सामान्यतः 5-7 किलोग्राम कपड़ों के लिए केवल 30-60 मिलीलीटर (लगभग 2-3 बड़े चम्मच) डिटर्जेंट पर्याप्त होता है। लिक्विड डिटर्जेंट न केवल कपड़ों के प्रति मुलायम होते हैं, बल्कि फॉस्फेट-मुक्त होने के कारण पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं। जैसे-जैसे भारतीय उपभोक्ता कपड़ों की देखभाल और उपकरणों की लंबी उम्र के प्रति जागरूक हो रहे हैं, लिक्विड और पॉड-आधारित डिटर्जेंट एक सस्टेनेबल और प्रभावी विकल्प के रूप में लोकप्रिय हो रहे हैं। सही मात्रा का चुनाव करके न केवल पानी और पैसे की बचत की जा सकती है, बल्कि कपड़ों को लंबे समय तक नया बनाए रखा जा सकता है।
