डॉ. नवीन आनंद जोशी
उज्जैन की पुण्यभूमि महाकाल वन में जब भगवान शंकर और माता पार्वती भ्रमण कर रहे थे, तब वहीं एक दृश्य ने माता के हृदय को सहसा आकृष्ट कर लिया — बालकों के समूह में एक बालक पुष्पों से अठखेलियाँ कर रहा था और अन्य बालक उस पर पुष्प वर्षा कर हर्षित हो रहे थे, मानो प्रकृति स्वयं उस बालक के निश्छल सौंदर्य पर मुग्ध हो उठी हो। शिवजी ने पार्वती से कहा कि यह बालक उन्हें अत्यंत प्रिय है, और इतना कहते ही उन्होंने वह बालक माता पार्वती को सौंप दिया। यहीं से आरंभ होती है ममता की वह अद्भुत गाथा, जो आज भी प्रत्येक माँ के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है — माता पार्वती ने उस बालक को देखते ही उसे अपने हृदय से लगा लिया, मानो वर्षों की प्रतीक्षा सहसा साकार हो गई हो। पुत्र को निकट से देखने और उसका दुलार करने की उत्कंठा में उन्होंने अपनी प्रिय सखी विजया को भेजा कि वह जाकर उस बालक गणेश को मना-समझाकर कैलाश ले आए। विजया ने जब बालकों के समूह में जाकर स्नेहपूर्वक उसे बुलाया, तो बालक स्वयं ही माँ के वात्सल्य की उस अदृश्य पुकार को सुनकर कैलाश की ओर चल पड़ा — यह दृश्य इस बात का प्रतीक है कि माँ का सच्चा प्रेम संतान को दूर से भी अपनी ओर खींच लेता है।
कैलाश पहुँचने पर माता पार्वती ने बालक गणेश का पालन-पोषण किसी सामान्य संतान की भाँति नहीं, अपितु अद्वितीय वात्सल्य और समर्पण के साथ किया। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से उसे विभिन्न दिव्य आभूषणों से सजाया, चंदन का लेप लगाकर उसकी देह को सुवासित किया और पुष्पों से उसका शृंगार कर उसे पुनः खेलने के लिए शिवगणों के समूह में भेज दिया। यह केवल बाह्य श्रृंगार नहीं था, यह एक माँ की वह आंतरिक साधना थी जिसमें वह अपनी संतान के संस्कार, सौंदर्य और स्वभाव — तीनों को एक साथ गढ़ती है। बालक वहाँ भी निश्छल भाव से पुष्पों संग खेलता रहा, क्योंकि माँ के दिए संस्कार बालक के स्वभाव में रच-बस गए थे। तत्पश्चात माता पार्वती ने भगवान शिव से अनुरोध किया कि यह उनका पुत्र है, अतः उन्हें ऐसा वरदान दें कि यह समस्त गणों में सर्वप्रथम पूज्य कहलाए, और चूँकि यह सदैव कुसुमों से मंडित रहता है, इसलिए इसका नाम “कुसुमेश्वर” हो। शिवजी ने पार्वती की इस वत्सलता भरी प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार करते हुए वरदान दिया कि जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक कुसुमेश्वर के दर्शन-पूजन करेगा, उसे जीवन में कभी पाप का भागी नहीं होना पड़ेगा, और जो पुष्पों से उनकी आराधना करेगा, वह अंतकाल में शिवलोक को प्राप्त होगा। इसी दिव्य वरदान के फलस्वरूप कुसुमेश्वर शिवलिंग के रूप में महाकाल वन में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो गए — चौरासी महादेवों की पावन शृंखला में 38वें क्रम पर विराजमान यह तीर्थ आज भी उज्जैन नगरी में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
यह कथा मात्र एक पौराणिक प्रसंग नहीं, अपितु आज के युग के लिए एक गहन सामाजिक संदेश भी समेटे हुए है। विचार कीजिए — माता पार्वती ने गणेश को जन्म नहीं दिया, फिर भी उन्होंने उसे अपने हृदय से गोद लेकर इस प्रकार पाला-पोसा, संस्कारित किया और संवारा कि वही बालक आगे चलकर सृष्टि का प्रथम पूज्य देवता बना। यह माँ के वात्सल्य और संस्कार की वह शक्ति है जो किसी भी साधारण बालक को असाधारण ऊँचाई तक ले जा सकती है। यदि आज भी भारत की प्रत्येक माँ अपनी संतान का पालन-पोषण उसी श्रद्धा, समर्पण और संस्कार के साथ करे, जैसे माता पार्वती ने किया था, तो निश्चय ही भारत का प्रत्येक बालक गणेश जी की भाँति बुद्धिमान, विनम्र और संस्कारवान बन सकता है। किंतु यह अत्यंत चिंताजनक विषय है कि आज पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण और तीव्र गति से बढ़ते डिजिटल युग में हमारे बच्चे मोबाइल की स्क्रीन में अश्लीलता और भटकाव भरी सामग्री में उलझते जा रहे हैं, जिससे उनके बाल्यकाल का वह निश्छल सौंदर्य और संस्कार धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है, जो कभी गणेश जी के बाल-स्वरूप में दिखाई देता था। यह समय की पुकार है कि हम इस पौराणिक प्रसंग से सीख लेते हुए सकारात्मक दिशा अपनाएँ — माताएँ अपनी संतान को समय दें, संस्कार दें, उन्हें पुस्तकों, पूजा-पाठ और सात्विक वातावरण से जोड़ें, ताकि आने वाली पीढ़ी मोबाइल की चकाचौंध से निकलकर पुनः भारतीय संस्कृति के मूल्यों की ओर अग्रसर हो सके। साथ ही यह कथा हमें यह स्मरण भी कराती है कि नारी ही सृष्टि की जननी और संस्कारों की संवाहिका है — अतः स्त्री जाति का सम्मान और आदर सुरक्षित रखना ही समाज को गणेश जी जैसे बुद्धिमान, सुसंस्कृत बालकों से समृद्ध करने का सर्वोत्तम मार्ग है। कुसुमेश्वर महादेव का यह तीर्थ इसी शाश्वत सत्य का जीवंत प्रमाण है कि एक माँ का सच्चा वात्सल्य ही किसी भी संतान को सर्वप्रथम पूज्य बना सकता है।
निरंतर जारी…
