आईआईटी मंडी में अंतरराष्ट्रीय एल.ए.आर.ए.एम. (LARAM) कोर्स 2026 का आगाज; हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन रोकने पर मंथन करेंगे वैश्विक विशेषज्ञ

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मंडी : हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Mandi) में आज एल.ए.आर.ए.एम. (लैंड स्लाइड रिस्क असेसमेंट एंड मिटिगेशन) कोर्स 2026 का शानदार शुभारंभ हुआ। छह दिनों तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य भूस्खलन जैसी आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए दुनिया भर के ज्ञान और व्यावहारिक समाधानों को साझा करना है।

इटली के यूनिवर्सिटी ऑफ सेलर्नो द्वारा स्थापित यह प्रतिष्ठित स्कूल भारत में दूसरी बार भौतिक रूप से आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों—जैसे ढलान अस्थिरता और बुनियादी ढांचे को होने वाले खतरों—को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है।


कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं:

  • वैश्विक भागीदारी: स्विट्ज़रलैंड, इटली, नॉर्वे और भारत के 10 दिग्गज विशेषज्ञ 40 चुनिंदा शोधार्थियों और पेशेवरों को उन्नत प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।
  • हिमालयी फोकस: पाठ्यक्रम में हिमालय की नाजुक भूगर्भीय संरचना और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण बढ़ते भूस्खलन खतरों पर विशेष सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।
  • व्यावहारिक अनुभव: व्याख्यानों के साथ-साथ प्रतिभागियों के लिए तकनीकी चर्चा और फील्ड विज़िट का भी आयोजन किया गया है, ताकि वे वास्तविक धरातलीय स्थितियों को समझ सकें।

विशेषज्ञों की राय:

एल.ए.आर.ए.एम. स्कूल के अध्यक्ष सेटीमियो फ़रलीसी ने कार्यक्रम के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हिमालय जैसे क्षेत्रों में इस कोर्स का आयोजन युवा शोधकर्ताओं को वास्तविक चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार करेगा। वहीं, कार्यक्रम के समन्वयक और C3DAR के अध्यक्ष कला वेंकटा उदय ने बताया कि विकास और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में पहाड़ी क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने के लिए वैश्विक ज्ञान का आदान-प्रदान अनिवार्य है।

प्रमुख आयोजक और सहयोगी:

यह कार्यक्रम आईआईटी मंडी के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डिजास्टर रिडक्शन (C3DAR) द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जिसे निम्नलिखित संस्थाओं का सहयोग प्राप्त है:

  • टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts)
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
  • अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF)

यह पहल न केवल शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करेगी, बल्कि आपदा प्रबंधन की दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भी मजबूत करेगी।

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