इंदौर आज अपने बुनियादी ढांचे के सबसे बड़े विस्तार और कायाकल्प के दौर से गुजर रहा है. गांधी नगर से मालवीय नगर चौराहे तक 17 किलोमीटर और 16 स्टेशनों में आकार लेता मेट्रो प्रोजेक्ट, फ्लाईओवर, कान्ह और सरस्वती पर चौड़े होते पुल, नए आरओबी, एलिवेटेड कॉरिडोर, पश्चिमी रिंग रोड, नर्मदा का चौथा चरण और सीवरेज लाइनें शहर के आधुनिक भविष्य की नींव रख रही हैं. विकास की यह रफ्तार निःसंदेह स्वागतयोग्य है, लेकिन जब यही निर्माण आम नागरिक की मानसिक शांति, कार्यक्षमता और सुगम आवागमन को लीलने लगे, तो ठहरकर मंथन करना जरूरी हो जाता है.
शहर के प्रमुख मार्गों और चौराहों पर इन दिनों विकास की धूल में आम शहरी का धीरज धुंधला रहा है. जगह-जगह अचानक सामने आते बैरिकेड्स, ऊंचे स्पीड ब्रेकर, गहरे गड्ढे और संकरी सड़कों के बीच स्कूल बसें, ई-रिक्शा, भारी वाहन, सीटी बसें, चार पहिया और दो पहिया वाहन एक-दूसरे से आगे निकलने की अंधी होड़ में उलझी हैं. प्रशासनिक निगरानी की विसंगति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फरवरी 2025 की समीक्षा बैठक में सत्यसाईं चौराहे के फ्लायओवर की प्रगति 36 प्रतिशत बताई गई, जबकि मौके पर वास्तविक प्रगति करीब 8 प्रतिशत ही पाई गई. जब निगरानी केवल फाइलों तक सीमित रह जाती है, तो सड़कों पर केवल अफरातफरी और जाम बचता है. ऊपर से रोजाना का वीआईपी मूवमेंट, अनाड़ी ड्राइविंग, नशे में वाहन चालन और समय पर पहुँचने का दबाव चालकों के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेता है. मामूली खरोंच लगते ही बात गाली-गलौज, हाथापाई और मौके पर हर्जाना वसूली तक पहुँच जाती है. यह स्थिति दर्शाती है कि सड़क पर जाम लगने से पहले हमारे धीरज में जाम लग रहा है.
सड़कों पर लगने वाले जाम और हादसों का मुख्य कारण केवल वाहनों की संख्या नहीं, बल्कि निर्माण एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी और लचर ट्रैफिक प्रबंधन है. इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए पाँच व्यावहारिक कदम तत्काल लागू करने होंगे:
- साझा डिजिटल मैपिंग: नगर निगम, मेट्रो, लोक निर्माण विभाग, विकास प्राधिकरण, जल विभाग, एनएचएआई, पाइप्ड गैस कंपनी, और निजी इंटरनेट फाइबर सेवा प्रदाता एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करें. एक के सड़क बनाने के तुरंत बाद दूसरा उसे खोद दे, यह सिलसिला सख्ती से बंद हो.
- पहले योजना, फिर खुदाई: किसी भी मुख्य मार्ग पर खुदाई केवल तभी शुरू की जाए जब सुगम वैकल्पिक मार्ग पूरी तरह तैयार और सुचारू हों. भारी निर्माण कार्य रात में किए जाएं और कार्यस्थलों पर पर्याप्त रोशनी, रिफ्लेक्टर व धूल थामने के लिए निरंतर पानी का छिड़काव अनिवार्य हो.
- नो-स्टॉप जंक्शन व समय अंतराल: चौराहों के ठीक मुहाने पर ई-रिक्शा और बसों के रुकने पर पूर्ण पाबंदी लगे; उनके लिए 50 से 100 मीटर दूर पिक-अप पॉइंट तय हों. प्रमुख स्कूलों और दफ्तरों के खुलने-बंद होने के समय में क्लस्टर स्तर पर 5 से 10 मिनट का अंतराल लागू किया जाए, जिससे पीक-आवर्स का एकमुश्त दबाव बंट सके.
- चालान से आगे-प्रबंधन: यातायात पुलिस की प्राथमिकता केवल चालानी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि उनका ध्यान बॉटलनेक हटाने और त्वरित रिस्पॉन्स पर केंद्रित हो. छोटी-मोटी टक्कर के बाद चौराहे बंधक न बनें, इसके लिए त्वरित डिजिटल स्पॉट-निपटारा लागू किया जाए और हुड़दंगियों पर तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाई हो.
- रिंग रोड बाईपास: पश्चिमी रिंग रोड के जरिए भारी व गुजरने वाले बाहरी यातायात को शहर के भीतरी हिस्से में प्रवेश करने से पहले ही डायवर्ट किया जाए.
प्रशासन सड़कें चौड़ी कर सकता है, पुलिस नियम बना सकती है, लेकिन वाहन चालक के भीतर ‘धैर्य’ कोई विभाग नहीं भर सकता. घर से मात्र पाँच मिनट पहले निकलना, अपनी लेन में चलना, रॉन्ग साइड न जाना, सिग्नल का सम्मान करना और किसी मामूली टक्कर को प्रतिष्ठा की लड़ाई न बनाना, ये वे छोटे मानवीय निर्णय हैं, जो शहर को सुरक्षित और सुगम बनाते हैं.
अरे ओ इन्दौरी भिया! सड़क पर जगह भले कम हो, पर अपने मन का धीरज कम मत होने दीजिए. सड़क किसी एक की नहीं, सबकी है,
पहले सुरक्षित पहुंचें, फिर जल्दी पहुंचें!
