कल एक मित्र के काम से भोपाल के छोला मंदिर थाने जाने का अवसर मिला। क्राइम रिपोर्टिंग छोड़े हुए करीब एक दशक हो गया है, इसलिए थानों में आना-जाना अब बहुत कम होता है। लेकिन जो नज़ारा यहां देखने को मिला, उसने मुझे यह लिखने पर मजबूर कर दिया।
थाने के मुख्य द्वार पर इतनी भीड़ थी कि लगा मानो किसी चिड़ियाघर में कोई नया जानवर आया हो और उसे देखने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा हो। अंदर कदम रखा तो हालात और भी चौंकाने वाले थे। सांस लेने तक की जगह नहीं, चारों तरफ फरियादी, आरोपी, पुलिसकर्मी और फाइलों का अंबार। न ठीक से हवा, न पर्याप्त रोशनी, न बैठने की जगह।
पुलिस अधिकारी और कर्मचारी जिस माहौल में काम कर रहे हैं, उसे देखकर हैरानी होती है कि आखिर वे इतने दबाव में काम कैसे कर लेते हैं। थाना प्रभारी का कक्ष देखकर यकीन करना मुश्किल था कि हम किसी राज्य की राजधानी के थाने में खड़े हैं। विवेचकों की बैठने की व्यवस्था ऐसी लगी मानो किसी पुराने स्कूल के कमरे में बच्चे पढ़ाई की तैयारी कर रहे हों।
कुछ ही देर में मेरा दम घुटने लगा, लेकिन वहीं बैठे पुलिसकर्मी रोज़ इसी माहौल में घंटों काम करते हैं। हम अक्सर पुलिस पर सवाल उठाते हैं, उनकी कमियों की चर्चा करते हैं, लेकिन क्या कभी यह देखने की कोशिश की कि उन्हें काम करने के लिए कैसी परिस्थितियां दी गई हैं?
सुना है कि नया थाना भवन बनकर तैयार है, फिर भी पुलिसकर्मी और आम लोग इस “चिड़ियाघरनुमा” थाने में काम चलाने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि आखिर और किस बात का इंतजार है? किसी बड़े हादसे का, किसी बीमारी का, या फिर किसी वीआईपी के यहां आने का?
मैं पुलिस की पैरवी नहीं कर रहा, बल्कि एक सच्चाई बयान कर रहा हूं। राजधानी के एक प्रमुख थाने की यह हालत है तो दूर-दराज़ के ग्रामीण थानों की स्थिति कैसी होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।
उम्मीद है कि यह पोस्ट उन अधिकारियों तक पहुंचेगी जिनके हाथ में फैसले हैं, ताकि छोला मंदिर थाना जल्द से जल्द नए भवन में शिफ्ट हो सके और पुलिसकर्मियों को भी इंसानों की तरह काम करने का माहौल मिल सके।
यह थाना नहीं, चिड़ियाघर है!
